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अमेरिका बराक ओबामा से निराश क्यों?
On 1/27/2010 8:10:22 PM

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बराक ओबामा ने एक साल में ऐसा क्या कर दिया कि उनकी लोकप्रियता का ग्राफ 80 से गिरकर 50 के आस-पास आ गया है? ऐसा तो प्रायः तभी होता है, जब कोई राष्ट्रपति वाटरगेट में फंस जाए या वियतनाम-इराक में पटखनी खा जाए। ओबामा के साथ ऐसा कुछ भी नहीं हुआ, तो भी अमेरिका के विद्वान निराशाजनक बातें कर रहे हैं। कह रहे हैं कि ओबामा का पिछले एक साल का रिकार्ड इतना खराब है कि वे दुबारा राष्ट्रपति नहीं बन सकते। यानी, वे अगले तीन सालों में भी कुछ खास नहीं कर पाएंगे। मेसेचुसेट्स की ताजा हार ने ओबामा को जबर्दस्त झटका दिया है। 47 साल से यह सीट डेमाक्रेट टेड कैनेडी के पास थी।

अब रिपब्लिकन स्काट ब्राउन की जीत को ओबामा की हार माना जा रहा है। निराशा का माहौल खासतौर से इसलिए बना है कि चुनाव-अभियान के दौरान ओबामा ने आशा की लहर उठाई थी। इसी पर सवार होकर पहले उन्होंने अपनी ही पार्टी की हिलेरी क्लिंटन को हराया और फिर रिपब्लिकन मेक्कैन को। अमेरिकियों को लगा था कि ओबामा उत्साही, सुसंस्कृत व जिम्मेदार राष्ट्रपति होंगे। अब एक साल बाद यदि उन्हें निराशा हो रही है, तो इसका कारण वे खुद हैं, क्योंकि उन्होंने ओबामा को जादूगर समझ लिया था, जबकि अमेरिका की आर्थिक स्थिति इतनी खराब है और विश्व राजनीति इतनी जटिल है कि ये दोनों किसी जादू-टोने से ठीक नहीं की जा सकतीं। यह क्या कम बडी बात है कि बुश जैसी अर्थव्यवस्था छोड गए थे, वह उससे नीचे नहीं गिरी, बेरोजगारी दस प्रतिशत पर टिकी हुई है, डॉलर का अवमूल्यन नहीं हुआ, लोग अमेरिका छोडकर भाग नहीं रहे हैं। ओबामा ने बैंकों और कार-कंपनियों को दिवालिया होने से बचाया, घरों की मंदी को संभाला और नए रोजगार पैदा करने की कोशिश की। उन्होंने अमेरिका के इतिहास में पहली बार ऐसी पहल की है, जिसके कारण अब कोई भी अमेरिकी नागरिक इलाज के अभाव में नहीं मर सकता। अमेरिका की चिकित्सा इतनी महंगी है कि लाखों गरीब व अश्वेत उसका सपना तक नहीं देख सकते। इस मरुस्थल में ओबामा ने करुणा के फूल खिलाए। फिर, ओबामा कोई महात्मा गांधी नहीं कि अमेरिकियों को सादगी के लिए प्रेरित कर सकें, पर वे ऐसी नीतियां बना रहे हैं कि अमेरिका का प्रदूषण थोडा कम हो। बुश की तरह क्योटो प्रोटोकॉल को उन्होंने भी स्वीकार नहीं किया है, पर कोपेनहेगन में उन्होंने प्रदूषण से लडने के लिए विकासशील देशों को सौ बिलियन डॉलर देने की घोषणा की है।

बेशक, विदेश नीति के क्षेत्र में भी ओबामा को कोई चमत्कारी सफलता नहीं मिली है, पर क्या यह सच नहीं है कि बुश की दुनिया से ओबामा की दुनिया काफी अलग है? यह ठीक है कि अपने वादे के मुताबिक ओबामा ग्वांतानामो का यंत्रणा-केंद्र बंद नहीं करवा पाए, पर यंत्रणा पर नियंत्रण अवश्य हुआ है। जहां तक इराक का सवाल है, अप्रैल-2009 में वे खुद अचानक वहां पहुंच गए और बाद में उन्होंने घोषणा की कि अगस्त-2010 में सारी अमेरिकी फौजों की वापसी हो जाएगी। इसी प्रकार जुलाई-2011 में अफगानिस्तान से अमेरिकी फौजें वापस होंगी। अगर सचमुच वैसा हो भी, तो क्या ओबामा महानायक नहीं बन जाएंगे? ओबामा को यह श्रेय भी दिया जाना चाहिए कि उन्होंने पाकिस्तान को खाली चेक नहीं दिया। यानी, ओबामा का एक साल अगर बेहतर नहीं रहा, तो वह निराश करने वाला भी साबित नहीं हुआ। पता नहीं अमेरिकी क्यों निराश हैं?

द्वारिका बी. कुंभज

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