मेरठ । जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री और केंद्रीय मंत्री फारुख अब्दुल्ला ने जहां बुर्के का विरोध करते हुए इसे हटाए जाने की वकालत की है। वहीं, दूसरी ओर कट्टरपंथियों ने इसे धर्म का मामला बताते हुए अब्दुल्ला को धार्मिक मसलों से दूर रहने की हिदायत दी है। मशहूर गीतकार जावेद अख्तर ने भी बुर्के को हटाने का समर्थन किया है। फारुख अब्दुल्ला ने सोमवार को यहां आयोजित एक कार्यक्रम में कहा कि शर्म आंखों में होती है, किसी पर्दे में नहीं। यदि आपकी आंखों में शर्म, हया नहीं है तो आप लाख पर्दों में रहें, उसका कोई मतलब नहीं निकलता। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि बुर्का धर्म को सीमित कर देता है। वहीं उनके इस बयान पर विवाद शुरू हो गया है और कई मुस्लिम संगठनों ने अपना विरोध जताया है। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि मैं अदालत के उस फैसले का सम्मान करता हूं, जिसमें मुस्लिम महिलाओं को मतदान के लिए पहचान पत्र बनाने के लिए बुर्का हटाने को कहा गया था। उन्होंने कहा कि हमारा धर्म इतना तंग नहीं है कि उस पर बुर्के का असर पडे। उन्होंने कहा कि धर्म पर एक का हक नहीं होता। यदि मुस्लिम कुरान को, हिंदू गीता को और ईसाई बाइबल को सीने से लगाकर यह कहे कि उस पर सिर्फ उसका अधिकार है, तो यह उसकी संकीर्ण मानसिकता है।
धर्म में टांग न अडाएं फारुख
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, ऑल इंडिया मुस्लिम महिला पर्सनल लॉ बोर्ड और दारूल उलूम ने फारुख के बयान पर कडी प्रतिक्रिया व्यक्त की है। पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य खालिद राशिद ने दो टूक शब्दों में कहा कि फारुख अब्दुल्ला धर्म के मामलों में टांग न अडाएं। उन्होंने कहा कि फारुख मुफ्ती नहीं हैं, जो धर्म के संदर्भ में कोई विचार व्यक्त करें। वहीं, दारूल उलूम के काजिम अब्दुल लतीफ ने भी फारुख अब्दुल्ला को आडे हाथों लेते हुए कहा है कि वो सिर्फ राजनीति करें और धर्म के मामलों में दखल न दें।
दूसरी ओर, एआईएमडब्ल्यू की अध्यक्ष शाइस्ता अंजुम ने कहा है कि फारुख को महिलाओं के बुर्के के बारे में कुछ भी कहने का अधिकार नहीं हैं। उन्होंने कहा कि कुरान में महिलाओं को पर्दे में रहने की बात कही गई है और फारुख इस तरह का बयान देकर कुरान का भी अपमान कर रहे हैं। |