कुल मिलाकर महिला आरक्षण विधेयक राज्यसभा में पारित हो ही गया। महिलाओं को आरक्षण देने की प्रक्रिया में सभी राजनीतिक दलों को अपने-अपने पूर्वाग्रहों से मुक्त होकर जिस तरह से इस लोकतंत्र के महायज्ञ में भागीदारी करनी चाहिए थी, चूंकि उस तरह की नहीं गई, इसलिए यह विधेयक उत्साह का संचार नहीं करता। सभी दलों ने महिला आरक्षण के नाम पर अपने े-अपने राजनीतिक हित ही साधे हैं। उन्होंने भी, जो इस विधेयक के पक्ष में थे और उन्होंने भी, जो इसके विरोधी थे। विधेयक-विरोधी अगर मांग कर रहे थे कि महिला आरक्षण में पिछडी और अल्पसंख्यक महिलाओं का कोटा अलग से निर्धारित किया जाना चाहिए, तो वे अपने वोट ही पक्के कर रहे थे।
उधर, जो इस विधेयक के समर्थन में ताल ठोंक रहे थे, वे भी राजनीति ही चमका रहे थे। यदि ऐसा नहीं होता, तो मंगलवार को राज्यसभा में विधेयक-समर्थकों के बीच वैसे विरोधाभास क्यों दिखते, जैसे दिखे हैं। भाजपा शुरुआत से ही विधेयक के पक्ष में थी, पर विधेयक ध्वनि-मत से पारित हो जाने के बावजूद इस पार्टी के नेता बहस कराने पर क्यों अड गए थे? जब ये लोग विधेयक के स्वरूप में कोई बदलाव नहीं चाहते थे, तो फिर बहस का अर्थ ही समाप्त हो गया था, पर जिद करके बहस कराई गई, तो केवल इसीलिए कि इस विधेयक को पारित कराने का श्रेय अकेली कांग्रेस ही न हडप ले। यह राजनीति नहीं है, तो और क्या है? सरकार में शामिल तृणमूल कांग्रेस भी उन सांसदों के पक्ष में रोती दिखी, जिन्होंने सोमवार को राज्यसभा की मर्यादा का हनन किया था और इनको मंगलवार को सदन से बाहर कर दिया गया था।
सही है कि ये सांसद जनता के चुने हुए नुमाइंदे थे, पर इन्होंने सोमवार को राज्यसभा और उसके सभापति उपराष्ट्रपति का जो निरादर किया था, उसके बाद यह सदन से निष्कासन से भी बडी सजा के पात्र बन गए थे, पर उनको जो छोटी-सी सजा मिली और अगर तृणमूल कांग्रेस का हृदय इतने में ही द्रवित हो उठा, तो वजह यही है कि यह पार्टी भी अपनी ही सरकार को अपने कदमों में झुका लेना चाहती थी। कांग्रेस ने जरूर समझदारी दिखाई कि उसको जिसने जितना झुकाया, वह उतनी ही झुकी, पर विधेयक को लटकने नहीं दिया। हां, इसकी वजह भी यही है कि उसको राजनीतिक लाभ इसी से मिलना था। इस पूरे तमाशे के बावजूद महिलाओं को खुश होना चाहिए कि विधेयक राज्यसभा में पारित हो गया। अब यह लोकसभा में भी नहीं रुकना चाहिए। |