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आओ, अफसोस जताएं
On 3/10/2010 1:01:24 AM

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कतर की नागरिकता स्वीकार करने के बाद जब मशहूर चित्रकार मकबूल फिदा हुसैन ने कहा था कि वे अब भी भारतीय हैं, तब देश में उनके इस बयान का स्वागत ही किया गया था। दरअसल, आशा यह थी कि वे कतर की नागरिकता छोडकर कभी भी स्वदेश वापस आ जाएंगे, पर अब उन्होंने भारतीय पासपोर्ट भी वापस कर दिया है। इसका अर्थ यह है कि उन्होंने भारत से हमेशा-हमेशा के लिए संबंध विच्छेद कर लिया है। निश्चित ही उनका यह कदम निराशाजनक है। यह तो सही है कि उनके कुछेक चित्रों को लेकर भारत के कट्टरपंथी हिंदू संगठनों ने उनके खिलाफ हिंसक वातावरण बनाया था। उधर, उनके खिलाफ देश की कई अदालतों में अनेक मुकदमे भी दायर किए गए थे, पर दोषी केवल हिंदू संगठन ही नहीं हैं। एमएफ हुसैन ने भी कई गलतियां की हैं।

मसलन-उन्होंने कट्टरपंथियों से संघर्ष करने की जगह देश छोडने का रास्ता चुना। अगर वे संघर्ष करते, तो मुट्ठीभर असामाजिक तत्वों को छोडकर पूरा देश उनका साथ देता। फिर, वर्तमान केंद्र सरकार ने उनको वापस लाने की कोशिश भी की। जहां गृह मंत्रालय ने उनकी सुरक्षा का वादा किया था, तो वहीं सुप्रीम कोर्ट ने भी आश्वस्त किया था कि उनके खिलाफ आपराधिक मामला बनता ही नहीं है, तो भी वह नहीं लौटे। फिर, कतर जैसे देश की नागरिकता स्वीकारना भी कोई समझदारी का काम नहीं था। वह देश न तो लोकतांत्रिक है और न ही धर्मनिरपेक्ष। वह एमएफ हुसैन, जिनको अरजी लगाने मात्र की देर थी और दुनिया का कोई भी मुल्क नागरिकता दे देता, वह अगर तोहफे में मिली कतर की नागरिकता स्वीकार कर लेते हैं, तो उनकी धर्मनिरपेक्ष छवि पर भी शंका होती ही है। बहरहाल, भारत से अलग होने का रास्ता हुसैन ने खुद चुना है। अतः अफसोस जताने के अलावा और किया भी क्या जा सकता है?

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