बहुत पुरानी बात है। एक रसायनशास्त्री किसी राज्य के राजवैद्य थे। जब वह बूढे हो गए, तो एक दिन उन्होंने राजा से कहा-मुझे एक सहायक की आवश्यकता है। तब राजा ने दो कुशल युवकों को उनके पास भेजा और कहा कि उनमें से जो भी ज्यादा योग्य लगे, उसे आप अपने साथ रख लीजिए। राजवैद्य ने दोनों युवकों की अनेक तरह से परीक्षा ली, लेकिन दोनों की योग्यता एक जैसी थी। यह देख राजवैद्य दुविधा में पड गए कि आखिर दोनों में से किसे रखें?
अंत में उन्होंने उन दोनों युवकों को एक पदार्थ दिया और कहा-इसे पहचानकर अपनी इच्छानुसार कोई भी एक रसायन बनाकर ले आना। अभी तुम दोनों जाओ और हां, तुम दोनों सीधे न जाकर राजमार्ग के रास्ते से जाना। दोनों राजमार्ग से होकर अपने-अपने घर चले गए। दूसरे दिन दोनों युवक राजवैद्य के पास आए। उनमें से एक युवक रसायन बनाकर लाया था, जबकि दूसरा खाली हाथ ही आया था। आचार्य ने रसायन की जांच की। उसे बनाने वाले युवक से उसके गुण-दोष पूछे। रसायन में कोई कमी नहीं थी। आचार्य ने दूसरे युवक से पूछा-तुम रसायन बनाकर क्यों नहीं लाए? उस युवक ने कहा-मैं पहचान तो गया था, लेकिन उसका कोई रसायन मैं तैयार नहीं कर सका। जब मैं राजमार्ग से जा रहा था, तो देखा कि एक पेड के नीचे एक बीमार व्यक्ति दर्द से तडप रहा है। मैं उसे अपने घर ले गया और उसी की सेवा में इतना उलझ गया कि रसायन तैयार करने का समय ही नहीं मिला।
राजवैद्य ने उसे अपना सहायक रख लिया। जब राजा को यह बात पता चली, तो उन्होंने दूसरे दिन राजवैद्य से पूछा-आचार्य, जिसने रसायन नहीं बनाया था, उसे ही आपने रख लिया। ऐसा क्यों? राजवैद्य ने कहा-महाराज दोनों एक ही रास्ते से गए थे। एक ने बीमार को देखा और दूसरे ने उसे अनदेखा कर दिया। रसायन बनाना कोई जटिल काम नहीं था। मुझे तो यह जानना था कि दोनों में कौन मानव सेवा करने में समर्थ है। बीमार चिकित्सक की दवा से ज्यादा उसकी सेवा भावना से ठीक होते हैं, इसलिए मेरे काम का व्यक्ति वही है, जिसे मैंने चुना है।
डॉ. हरिश्चंद्र झा |