|
बेंगलुरु । कर्नाटक उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश पीडी दिनाकरन पर फिर से निशाना साधते हुए न्यायमूर्ति डी वी शैलेंद्र कुमार ने उनसे प्रशासनिक कार्यों से दूर रहने को कहा है क्योंकि भूमि पर कब्जा करने के आरोपों को लेकर उनके खिलाफ महाभियोग की कार्यवाही अभी लंबित है। न्यायमूर्ति कुमार ने कहा कि यह बेहद तकलीफदेह घटनाक्रम है। न्यायमूर्ति दिनाकरन को आठ मार्च को लिखे गए पत्र और अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित इस पत्र में न्यायमूर्ति कुमार ने शिष्टाचार और नैतिकता के मुद्दों को भी उठाया है और मांग की कि उन्हें पूर्ण वेतन और एक नियमित मुख्य न्यायाधीश को मिलने वाली सुविधाएं भी नहीं लेनी चाहिए।
न्यायमूर्ति कुमार ने कहा कि यह स्वीकार्य है जब वह सामान्य मुख्य न्यायाधीश के तौर पर न्यायिक कार्य कर रहे हैं। लेकिन आफ मामले में आप न्यायिक कार्य नहीं कर रहे हैं और आप महाभियोग की कार्यवाही का भी सामना कर रहे हैं। भूमि पर कब्जा करने का आरोप लगने के कारण उच्चतम न्यायालय में उनकी पदोन्नति रुक जाने के बाद न्यायमूर्ति दिनाकरन 17 दिसंबर 2009 से किसी भी पीठ में शरीक नहीं हो रहे हैं। न्यायाधीशों के अपनी संपत्ति सार्वजनिक करने की खुलेआम वकालत करने को लेकर चर्चा में आए न्यायमूर्ति कुमार ने न्यायमूर्ति दिनाकरन को लगातार निशाना बनाया है। न्यायमूर्ति दिनाकरन के खिलाफ राज्यसभा में महाभियोग की कार्यवाही लंबित है।
दिनाकरन के कथित तौर पर भूमि पर अतिक्रमण करने के मामले में सर्वे आफ इंडिया के दल द्वारा अपनी रिपोर्ट जमा करने को लेकर मीडिया रिपोर्ट का हवाला देते हुए न्यायमूर्ति कुमार ने कहा कि इसके मद्देनजर शिष्टाचार, औचित्य और मानदंडों का तकाजा है कि आपको मुख्य न्यायाधीश के तौर पर न्यायिक और प्रशासनिक दोनों में से कोई कार्य नहीं करना चाहिए।
उन्होंने कहा कि यह सेवा कानून का मूलभूत सिद्धांत है। उन्होंने कहा कि आप एक जज के रूप में संवैधानिक पद और उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश का पद संभाल रहे है, इस तथ्य से निलंबित कर्मचारी को कोई भी काम करने से रोके जाने के सिद्धांत पर बहुत फर्क नहीं पडना चाहिए। न्यायमूर्ति कुमार ने मांग की कि दिनाकरन को उच्च न्यायालय के कालेजियम की अध्यक्षता भी नहीं करनी चाहिए। यह कालेजियम उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के तौर पर नियुक्ति की सिफारिश करने के लिए नामों का चयन करता है। |