| | भारत का वैचारिक-सांस्कृतिक संकट | | | |
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जब दिल्ली स्थित ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (एम्स) मंडल-दो विरोधी आंदोलन का केंद्र बना हुआ था, तब उसके निदेशक डॉ. वेणुगोपाल थे। ऐसा होता है कि जब किसी की जिस भूमिका को लेकर कोई कुछ कहना चाहता है, तो उस पर बात करने की जगह उसकी किसी दूसरी भूमिका को सामने रख दिया जाता है। वेणुगोपाल देश ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय स्तर के हृदय विशेषज्ञ हैं, पर उनकी आरक्षण विरोधी भूमिका को सुनने को लोग तैयार नहीं थे। दरअसल, अपने हितों को साधने का सबसे अच्छा तरीका यही होता है कि जिस विशेषण पर हमला हो, उसकी शक्ल बदल दी जाए। अटल बिहारी वाजपेयी ईमानदार हैं, भारतीय राजनीति में यह सबसे ज्यादा प्रचारित विशेषण है। क्या कोई सांप्रदायिक व्यक्ति ईमानदार नहीं हो सकता या कोई ईमानदार व्यक्ति सांप्रदायिक नहीं हो सकता? इसी तरह, क्या कोई धर्मनिरपेक्ष पैसे के मामले में बेईमान नहीं हो सकता या कोई बेईमान व्यक्ति धर्मनिरपेक्ष नहीं हो सकता?
सब हो सकता है , पर अपने समाज में बुनियादी तौर पर जो कुछ घटित होता है, उसे बतौर घटना सतह पर आने से रोक दिया जाता है। इसी की वजह से वैचारिक भ्रम की स्थिति बनी हुई है। किसी भी स्थिति का मूल्यांकन करने और उसे ठीक-ठीक सूत्रबद्ध करने की पद्धति में ही गडबडी पैदा कर दी जाए, तो स्थिति को दुरुस्त करने की कवायद सफल नहीं हो सकती। इस काम को हमारे शासक वर्ग ने बडी साफगोई से किया है। लोगों में एक आदत विकसित कर दी गई है कि वे किसी को दिए जाने वाले एक विशेषण में कई विशेषण जोड लें। जैसे-किसी पुलिस अधिकारी ने अपने प्रशासनिक दायित्वों के तहत किसी बलवेबाज या सांप्रदायिक व्यक्ति को गिरफ्तार कर लिया, तो मान लिया जाए कि वह धर्मनिरपेक्ष है। वह धर्मनिरपेक्ष होगा, तो लोकतांत्रिक भी होगा, ईमानदार भी होगा। इसका एक खतरा यह होता है कि वह इन सबकी आड में अपने पुलिसिया चरित्र को छिपा लेता है, जो दमनकारी होता है। आखिर, हम किसी विशेषण का स्वतंत्र अस्तित्व बने रहने देने से क्यों घबराते हैं? क्या हमें किसी को भी देवता बना देने की आदत पडी हुई है? जब तक किसी के साथ कई विशेषण नहीं लगा दिए जाएं, तब तक वह देवता कैसे बन सकता है? इससे एक गंभीर वैचारिक-सांस्कृतिक संकट खडा हो गया है, पर बात केवल विशेषणों तक ही सीमित नहीं है। बात विशेषणों की संस्कृति की भी करनी होगी।
जैसे -हमारे समाज में डिग्रीधारी लोगों को पढा-लिखा माना जाता है। इसमें समझदारी का भाव भी शामिल होता है और आधुनिक होने का भी, पर ऐसा पढा-लिखा व्यक्ति जातिवादी भी हो सकता है, दहेजखोर, अलोकतांत्रिक और बेईमान भी। हुआ यह है कि आधुनिक तकनीक में प्रशिक्षितों को हमने विद्वान मान लिया है, जबकि आधुनिकता का संबंध टाई, कोट, जींस और अंग्रेजी बोलने से नहीं होता। इसका सीधा संबंध विचारों से है। अपने आसपास ठहर कर देखें कि कैसे आधुनिकता का दर्जा पाने वाला हिस्सा बर्बर विचारों के साथ खडा है। उसे देखकर मध्ययुग के इतिहास के पन्ने लडखडाते दिखने लगते हैं। इसलिए कि अब प्रशिक्षण को ही शिक्षा मान लिया गया है, जबकि इन दोनों में बुनियादी अंतर है। प्रशिक्षित डॉक्टर अगर शिक्षित भी हो, तो वह अपने मरीजों के लिए वही दवा लिखेगा, जो जरूरी होगी। वो दलाली नहीं करेगा। विशेषणों की जो संस्कृति विकसित हुई है, उसमें हमें दलाल दिखाई ही नहीं पडता।
अनिल चमडिया |
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