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देश की व्यवस्था किस तरह ध्वस्त -प्राय है, इसको इससे जानें कि महंगाई के इस दौर में भी पंजाब, हरियाणा और उत्तरप्रदेश के सरकारी गोदामों में लगभग चार हजार टन अनाज नष्ट हो गया है। मोटा आकलन यह है कि इसकी कीमत ढाई करोड रुपए थी। गोदामों के प्रबंधकों ने इस अनाज को करीब पौने दो लाख रुपए खर्च करके फिकवा भी दिया। जब इस अपराध की कहीं कोई चर्चा तक नहीं हुई, न इसकी ओर संबंधित राज्यों के शासन-प्रशासन का ध्यान गया, न ही स्वर्ग की सीढियां, भूतों का घर और राहुल महाजन का स्वयंवर दिखाने वाले इलेक्ट्रानिक मीडिया की नजर भी इस पर पडी, तो इससे यह तो साबित हो ही जाता है कि अपराधियों के खिलाफ कोई कार्रवाई भी नहीं होगी।
ऐसे अपराध होते ही उस व्यवस्था में हैं , जो परले दरजे की लापरवाह होती है। मानवीय संवेदनाओं से जिसका कोई लेना-देना नहीं होता। दुर्भाग्य यह है कि हम भारतीय ऐसी ही व्यवस्था में रहने के लिए अभिशप्त हैं। दरअसल, हमारे भाग्यविधाताओं को केवल अपनी-अपनी पडी है। अतः इस सडी-गली व्यवस्था को कौन बदले? इस लोकतंत्र ने उनके घरों में छप्पर फाडकर इतनी दौलत बरसाई है कि उन्हें आमजन की तकलीफों का ज्ञान ही नहीं हो पाता। नोटों के बिस्तर पर सोने वाले राजनीतिज्ञ और अफसर क्या जानें अन्न के दानों का मोल? जनता दाने-दाने को तरसे, तो तरसती रहे। गोदामों में रखा अनाज सडता-गलता है, तो खूब सडे-गले, उनकी बला से। इससे उनकी सेहत पर क्या फर्क पडना है? उनकी सेहत पर इससे क्या फर्क पडा कि करीब उतना अन्न नष्ट हो गया, जिससे एक अनुमान के मुताबिक देश के करीब 42 हजार लोगों का पेट सालभर तक भरा जा सकता था? कुछ भी तो नहीं हुआ।
हां , व्यवस्था अगर इतनी जवाबदेह होती कि नष्ट हुए अन्न की कीमत इसके लिए जिम्मेदार तत्वों की जमीन-जायदाद नीलाम करके वसूली जाती और चूंकि उन्होंने अन्न के संरक्षण में लापरवाही करके अपना फर्ज भी नहीं निभाया था, इसलिए उनको नौकरी से हटाकर सीधा जेल भी भेज दिया जाता, तो ऐसी आपराधिक लापरवाहियों पर रोक भी लगती। मगर, हकीकत तो यह है कि अपने देश में ऐसे कठोर कदम उठाने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। देश में लोकतंत्र है न! ऐसा लोकतंत्र, जिसमें तंत्र की जीभ हमेशा लोक को निगलने के लिए लपलपाती रहती है। इस तंत्र को जवाबदेह बनाना होगा, वरना वह लोकतंत्र को भी वैसे ही सडा-गला देगा, जैसे अन्न को सडा-गला दिया। |