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भोपाल। सूरज की तपिश अभी चरम पर नहीं पहुंची है। बावजूद इसके ताल -तलैयों और प्रमुख घाटों पर नहाने वालों का हुजूम उमडने लगा है। इनमें उन बच्चों की संख्या अधिक है जो तैरना सीख रहे हैं या तैराकी में पूरी तरह से दक्ष नहीं हैं। दूसरी ओर प्रशासन ने आंखें मूंद रखी हैं। क्योंकि इन बच्चों के जीवन की सुरक्षा के कोई इंतजाम नहीं किए गए हैं। यही कारण है कि शहर में बीते 15 दिनों में आधा दर्जन से अधिक बच्चों की डूबने से मौत हो चुकी है। यह आंकडा भयावह है। क्योंकि अभी तो गर्मी की शुरुआत है।
आबादी 20 लाख गोताखोर चार
शहर की आबादी 20 लाख का आंकडा छूने को है। जबकि यहां दो दर्जन से अधिक ताल-तलैया और छोटे-बडे घाट व खदानें हैं। इसके बावजूद गोताखोरों की संख्या पर्याप्त नहीं है। 20 लाख आबादी के बीच नगर निगम के पास सिर्फ चार गोताखोर हैं।
लाश निकालने जाते हैं
ऐसा कम ही हुआ है जब गोताखोर किसी डूबते की जान बचा पाते हैं। घटना होने के बाद लाश निकलवाने के लिए ही गोताखोरों को बुलाया जाता है। जब तक इन्हें किसी के डूबने की सूचना मिलती है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। इनका काम पानी की गहराई से सिर्फ लाश निकालने का रह जाता है।
ऐसे बचीं कई जानें
जानलेवा और खतरनाक किनारों पर कुशल गोताखोरों की तैनाती हर लिहाज से फायदेमंद है। इसका ताजा उदाहरण है रेतघाट स्थित बडे तालाब का किनारा। विगत फरवरी माह में एक युवती ने आत्महत्या करने के उद्देश्य से तालाब में छलांग लगा दी थी। खुशकिस्मती से वहां तलैया थाना के आरक्षक ड्यूटी पर थे। युवती के कूदने की जानकारी मिलते ही आरक्षक ने तालाब में छलांग लगाकर उसकी जान बचाई। रेतघाट पर तैनात पुलिसकर्मी इसी तरह कई लोगों की जान बचा चुके हैं।
चेतावनी बोर्ड सिर्फ दिखावा
कहने को प्रशासन ने राजधानी के कुछ जानलेवा घाट और डैमों पर चेतावनी सूचक बोर्ड लगा रखे हैं , लेकिन इनका कोई महत्व नहीं रहा है। कई जगह तो इन पर कपडे सुखाने का काम किया जा रहा है और कई स्थानों से बोर्ड ही गायब हो चुके हैं। लोगों को पता ही नहीं चलता कि उक्त स्थान तैराकी के लिए कितना खतरनाक और गहरा है।
खदानें दे रहीं दावत
राजधानी के ग्रामीण क्षेत्रों में क्रेशरों की भरमार है। रातीबड , परवलिया, सूखी सेवनिया और गुनगा थाना क्षेत्रों में खुदी हुई खदानें बडे-बडे गड्ढों का रूप ले चुकी हैं। इनमें बारिश का पानी जमा हो जाता है। बीते एक साल के दौरान आधा दर्जन से अधिक बच्चों की मौत इन गड्ढों में डूबने से हो चुकी है।
12 घाट चिह्नित
हालांकि प्रशासन ने करीब एक दर्जन ऐसे घाट और किनारों को चिह्नित किया है जहां हर साल डूबने की घटनाएं अधिक होती हैं , इसके बावजूद उक्त स्थानों पर गोताखोरों को तैनात नहीं किया गया है। इनमें से कुछ स्थानों पर चेतावनी बोर्ड लगाकर इतिश्री कर ली। जबकि आम जनता और कई संगठन नियमित रूप से गोताखोर तैनात करने की मांग कर चुके हैं। |