| | इच्छाधारी नाग-नागिन व इच्छाधारी साधु | | | |
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हमने अभी तक इच्छाधारी नाग -नागिनों के बारे में ही सुना था, पर अब इच्छाधारी बाबा भी होने लगे। सुना था, कुछ पहुंचे हुए लोग इच्छामृत्यु का वरण करते हैं, लेकिन वे इच्छाधारी कभी नहीं कहलाए। वैसे स्वेच्छाचारी भी बहुत होते हैं। जमाने में उनकी कमी नहीं, पर इच्छाधारी बाबा पहली बार सामने आया है, इसलिए उसके अनुयायियों को दोष नहीं दिया जा सकता कि वे उसके भक्त कैसे बन गए? उन्हें ऐसा अनोखा बाबा पहली बार मिला था, जो इच्छाधारी हो। वरना, तो साधु-संत और बाबा जन-इच्छाओं पर अंकुश रखने, उन्हें कुचलने, उनका दमन करने और उन्हें मारने के ही उपदेश देते हैं।
बाबा अपनी इच्छाएं तो पूरी करते रहते हैं , पर भक्तों को उपदेश देते हैं कि सारी बुराइयों की जड इच्छाएं ही हैं। भक्तों को तो पहली बार ऐसा बाबा मिला है, जो अपने नाम से ही ‘और ज्यादा विश करो’ टाइप दिखाई देता था। वे क्या जानते थे कि वह इच्छाधारी तो नहीं, पर व्यभिचारी जरूर है। वे बेचारे विश्वास करते रहे होंगे कि इच्छाधारी बाबा उनकी सारी इच्छाएं अवश्य पूरी करेगा।
भगवान तो आजकल किसी की इच्छा पूरी करते नहीं। लगता है , लोगों की इच्छाएं पूरी करने का काम उन्होंने ऐसे ही बाबाओं को आउटसोर्स कर दिया है। उन्हें क्या पता था कि यह बाबा तो अपने ही स्वेच्छाचार में लगा रहेगा। वैसे इच्छाधारी नाग-नागिनों के किस्से तो यह हैं कि जब उनको नाचना-गाना होता है, मौज-मस्ती करनी होती है, तो वे इनसानों का रूप धर लेते हैं। फिल्मों में तो यही दिखाया जाता है। बताते हैं कि मिलन की बेला में अगर किसी के हाथों कोई नाग मारा जाता है, तो फिर इच्छाधारी नागिन किसी सुंदरी का रूप धरकर उससे बदला लेने निकल पडती है।
सुना है , यह इच्छाधारी बाबा भी रूप बदलता था। भले ही किसी से बदला लेने के लिए न बदलता हो, पर इसने बहुत रूप बदले। अब तक सिक्योरिटी गार्ड, मसाज पार्लर वाले, कॉलगर्ल्स के दल्ले आदि के उसके अनेक रूप सामने आ चुके हैं। सुना है कि डकैत के रूप में भी उसने काम किया है। इस मायने में उसे बहुरूपिया तो कहा जा सकता है, पर इच्छाधारी नहीं। समस्या यह भी है कि वह बहुरूपिया बाबा भी नहीं कहला सकता। यह ठीक बात है कि ऐसे बहुरूपिए बाबा बहुत होते हैं, पर वे अपना नाम बहुरूपिया नहीं रखते। नाम में चाहे कुछ न रखा हो, तो भी वे इच्छाधारी-टाइप आकर्षक नाम ही रखते हैं।
वैसे अगर इच्छाधारी नाग -नागिनों के स्टैंडर्ड से देखा जाए, तो उसका यह नाम कुछ गलत भी नहीं था। वह भी दिन में भगवा धारण करता था, ताकि लोग इच्छाओं की पूर्ति के लिए उसके चरणों में लोटते रहें और रात में जींस-टीशर्ट में आ जाता था, ताकि स्वेच्छाचारियों की इच्छाएं पूरी कर सके। यह तो पता नहीं चला कि वह खुद कितनी मौज-मस्ती करता था, पर इतना जरूर पता चल रहा है कि वह स्वेच्छाचारियों के लिए मौज-मस्ती की व्यवस्था करता था। इसे दलाली ही कहा जाता है। यह एक तरह से यथा नाम-तथा गुण वाला मामला ही था, पर आपका यह पूछने का हक जरूर बनता है कि फिर वह बाबा कैसे था? वह दलाल तो हो सकता है, बाबा कैसे हो सकता है?
अगर नाग -नागिनों के स्टैंडर्ड से देखें, तो मौज-मस्ती के लिए इनसान का रूप धरने वाले नाग भी आखिर रहते तो नाग ही हैं। इसी तरह जींस-टीशर्ट वाला रूप धरने के बाद भी बाबा को बाबा कहना कैसे छोडा जा सकता है? फिर बाबाओं वाले सारे टोटके भी वह दिखा रहा था। सत्संग करता था। भव्य आश्रम बनवाता था। चैरिटी करता था। अस्पताल बनवाता था। अगर जागरण, भंडारे और चैरिटी करने से पाप धुल जाते हैं, तो उसके भी धुलते ही रहे होंगे।
सहीराम |
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