| | भारतीय हॉकी में सुधार की संभावनाएं | | | |
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केवल भारत में आयोजित होने के कारण अगर कोई व्यक्ति भारतीय हॉकी टीम से विश्व कप में चमत्कार की उम्मीद कर रहा था , तो वह गलत ही था। ऐसे लोगों को नहीं भूलना चाहिए कि आठ बार की ओलिंपिक चैंपियन टीम बीजिंग ओलिंपिक के लिए क्वालीफाई भी नहीं कर पाई थी। हाल के वर्षों में भारतीय हॉकी के साथ जैसे प्रयोग किए गए हैं, उन्हें देखते हुए भी ज्यादा उम्मीद करना गलत ही था। इसीलिए पहले मैच में पाकिस्तान के खिलाफ दमदार जीत के बाद हमारी टीम की लगातार पराजय आश्चर्यजनक नहीं है। पाकिस्तान के खिलाफ जीत को भी संयोग ही माना जाना चाहिए या फिर यह कि वहां की हॉकी भी भारतीय हॉकी की तरह ही बीमार है।
इस टूर्नामेंट में पाकिस्तान की भी भद्द ही पिटी है। यानी , उसको हराकर टीम इंडिया ने कोई मैदान नहीं मार लिया था। भारतीय टीम के बिखराव का नमूना यह है कि पहले मैच को छोडकर शेष सभी में हमारी डिफेंस लाइन बदतर ही रही। अग्रिम पंक्ति में भी राजपाल सिंह, तुषार खांडेकर और प्रभजोत सिंह ने जो तेजी पाकिस्तान के खिलाफ दिखाई थी, वह बाद के मैचों में कभी नहीं दिखी। खिलाडियों के चयन पर भी अब उंगलियां उठाई जाने लगी हैं। जैसे -संदीप सिंह भले ही ड्रेग फ्लिक एक्सपर्ट के तौर पर संतोषजनक रहे हों, लेकिन रिवर्स और टैक्लिंग में वे भी सिफर ही साबित हुए। प्रभजोत सिंह की सुस्ती पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं, लेकिन मुश्किल यह है कि टीम इंडिया के पास इतने खिलाडी नहीं हैं कि आसानी से चयन हो सके। ऐसे में चयन के दौरान थोडा-बहुत ऊंच-नीच तो हो ही जाता है। यह सही है कि भारतीयों में प्रतिभा की कोई कमी नहीं है, लेकिन सिंथेटिक टर्फ पर अभ्यास न होने का खामियाजा हमारे खिलाडियों को भुगतना ही पडता है। फिर, हमारे हॉकी के नियंताओं को समझना यह भी होगा कि यूरोपीय शैली अपनाए बिना अब भारत का हॉकी में एक ताकत बनना मुमकिन नहीं है। इस शैली ने हॉकी के एशियाई प्रतिमानों को बहुत पहले ही ध्वस्त कर दिया था। एशियाई शैली की तरह यूरोपीय शैली में खिलाडियों की कोई तय जगह नहीं होती। यानी, इसमें एक डिफेंडर को भी गोल करते देखा जा सकता है। जाहिर है कि इसके लिए शारीरिक चुस्ती-फुर्ती और मानसिक तैयारी की बेहद जरूरत है। पोजीशनिंग न होने के कारण इसमें खास खिलाडियों पर नजर रखने का फॉर्मूला भी काम नहीं आता। यूरोपीय शैली अपनाना इसलिए भी समय की मांग है कि दूसरी टीमें एशियाई शैली की कमजोरियों का फायदा उठा लेती हैं।
आस्ट्रेलिया के खिलाफ मैच में यही हुआ , जब हमारी डिफेंस लाइन, हॉफ लाइन और फॉरवर्ड लाइन, तीनों ही तहस-नहस हो गईं। संतोष की बात कुल इतनी ही है कि बहुत कम समय में चीफ कोच होसे ब्रासा ने टीम इंडिया को पटरी पर लाने की कोशिश की है। यह बात अलग है कि टीम पटरी पर फिर भी नहीं आ पाई है। इसके बाद इंग्लैंड के खिलाफ हुए मैच में हमारी टीम का भी प्रदर्शन बुरा नहीं था। उसमें सुधार की गुंजाइश तो थी, पर उसको एकदम गलत भी नहीं ठहराया जा सकता है। इन सब कारणों से लगता यह है कि इस बार टीम इंडिया की रैंकिंग सातवीं या आठवीं रहेगी, जबकि पिछली बार की रैंकिंग ग्यारहवीं थी। क्या हॉकी के हमारे नीति-नियंता होसे ब्रासा को इतना वक्त देंगे, जिससे वे भारतीय हॉकी का कायाकल्प करने में सक्षम हो सकें? अगर समय देंगे, तो हॉकी का कायाकल्प भी होगा।
मुकेश तोमर |
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