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अनूठा है भगवान श्रीकृष्ण का चरित्र
On 9/1/2010 12:04:23 AM

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भारतीय आख्यान यदि श्रीकृष्ण को पूर्णावतार कहता है, 16 कलाओं से युक्त, तो इसके कारण बडे वाजिब हैं। कौन-सा गुण-अवगुण ऐसा है, जो श्रीकृष्ण में नहीं है? कौन-सा कार्य ऐसा है, जो श्रीकृष्ण नहीं कर सकते? कौन-सा खांचा ऐसा है, जिसमें मधुसूदन को फिट किया जा सके? वे सभी खांचे तोडकर बाहर आ जाते हैं। उनका व्यक्तित्व बंधी-बंधाई लकीर पर नहीं चलता है, बल्कि पुरानी लकीरों को मिटाता है और नए रास्तों का निर्माण करता है। ऐसे महामानव को भगवान और नारायण का पूर्णावतार नहीं कहा जाए, तो और क्या कहा जाए? यह तो हम जानते ही हैं कि माधव किसी चक्रवर्ती सम्राट के पुत्र नहीं थे। वे कंस के कारागार में पैदा हुए थे और बडी मुश्किल से उन्हें बचाया जा सका था। बचपन में उन्हें अपने वास्तविक माता-पिता देवकी-वसुदेव का सान्निध्य तक नहीं मिला। उनका पालन-पोषण यशोदा-नंद ने किया।

यदि ऐसा अर्द्ध-अनाथ बालक युवा होते-होते भगवान का अवतार माना जाने लगे और सामने आने वाली सभी चुनौतियों का धैर्य, साहस और वीरता पूर्वक सामना करके इस लोकधारणा को सही साबित भी करने लगे, तो निश्चित ही वह विशिष्ट तो रहा ही होगा। स्वाभाविक है कि राजमहलों के बाहर के लोकनायक को देखकर राजे-महाराजाओं की भृकुटियां भी टेडी हुई होंगी। राजा कब चाहते हैं कि लोकनायक झोपडियों में पैदा हों? हो भी जाए, तो वे उसको मारने के उपक्रम क्यों न करें? यह क्षमता श्रीकृष्ण में ही थी कि उन्होंने सभी कुटिल चालों को विफल किया। सबको यथायोग्य प्रति-उत्तर दिया। अपने चरणों में ऊंचे-ऊंचे सिंहासनों को झुकाया। जो नहीं झुका, उसे सबक सिखाया। उन्होंने समकालीन राजनीतिक जडता को ही छिन्न-भिन्न नहीं किया, सामाजिक रूढियों पर भी प्रहार किया।

जननायक को होना भी श्रीकृष्ण जैसा चाहिए। जहां घी सीधी उंगलियों से न निकले, वहां उन्हें टेडी करने में कैसा हर्ज? वे कूटनीतिज्ञ भी थे। सत्य-अर्द्धसत्य और कभी-कभी झूठ का भी यथोचित इस्तेमाल कर लेते थे। पक्षपात भी करते थे, क्रोध भी उन्हें अंततः आ ही जाता था। प्रतिज्ञा कर लेते थे, तो एकाध प्रतिज्ञा तोड भी देते थे और सिद्ध कर देते थे कि मानवता के हित के सामने उनकी प्रतिज्ञा की कोई कीमत नहीं है। वे एकदम निडर थे, पर जरूरत पडने पर डर भी जाते थे। जरासंध और कालयवन के सामने क्या वे भयभीत नहीं हो गए थे? श्रीकृष्ण जितने सफल व्यक्तित्व हैं, उतना कोई दूसरा वास्तविक या काल्पनिक व्यक्ति दुनिया के इतिहास में नहीं दिखता। वे सर्वश्रेष्ठ हैं। सर्वोपरि हैं, समग्र हैं। वे नाच सकते हैं, तो गंभीर मुद्रा में बैठकर उपदेश भी दे सकते हैं। इसके लिए उन्हें नीरवता की जरूरत नहीं है। युद्ध का मैदान भी उन्हें उपदेश देने के लिए प्रेरित कर सकता है। जरूरी नहीं कि उनके प्रवचन सुनने के लिए भीड ही एकत्रित हो। कोई एक अर्जुन ही पर्याप्त होता है, धर्म के मार्ग पर चलाने के लिए।

स्त्री-पुरुष संबंधों को लेकर जितना खुलापन और वह भी रूग्ढ नहीं, स्वस्थ, कृष्ण के यहां है, उतना कहीं नहीं। न भूतो, न भविष्यति। मगर, कृष्ण लंपट नहीं हैं। वे द्रोपदी के स्वयंवर में उपस्थित थे, पर उन्होंने अर्जुन की इच्छा को देखते हुए मत्स्यवेध नहीं किया। द्रोपदी आजीवन स्वयं को श्रीकृष्ण की प्रेमिका कहती रहीं और वे भी उसे अपनी सखी मानते रहे। उसे हमेशा संकटों और अपमान से बचाया, पर स्पर्श कभी नहीं किया। कृष्ण-द्रोपदी की यह अशरीरी प्रेमगाथा विश्व के साहित्य में अनूठी है।

कुछ लोग कहते हैं कि कृष्ण वास्तविक नहीं, एक काल्पनिक चरित्र का नाम है। हो सकता है कि उनकी बात सच हो, पर इससे क्या फर्क पडता है? करोडों हिंदू उन्हें भगवान से कम मानने को तैयार नहीं और लाखों गैर-हिंदू और गैर-भारतीय भी उनके अनुयायी हैं। श्रीकृष्ण को ऐतिहासिक अतिमानव कह देने से उनके ईश्वरत्व पर कोई प्रभाव नहीं पडता। सच तो यह है कि भारत के हिंदू-दर्शन के बारे में इन दिनों जो जिज्ञासा देखने को मिल रही है, हिंदुत्व का जो प्रचार-प्रसार दुनिया में हो रहा है, उसमें श्रीकृष्ण के चरित्र का भारी योगदान है। श्रीकृष्ण का दर्शन नास्तिकों और दूसरे धर्मों के अनुयायियों को भी दिशा देता है। अतः आओ, हम योगिराज श्रीकृष्ण को प्रणाम करें।

--जोसुआ फ्रेंकफर्ट

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