| | स्विस बैंकों से वापस नहीं आएगा कालाधन | | | |
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स्विस बैंकों से भारतीयों का कालाधन कभी वापस नहीं आ सकता। जो लोग ऐसी पहल करते लगते हैं , वे केवल दिखावा ही करते हैं।
जो लोग मानकर चल रहे हैं कि भारत व स्विट्जरलैंड के बीच दोहरे कराधान से बचने की संधि पर हस्ताक्षर हो जाने के बाद अब स्विस बैंकों में जमा भारतीयों के कालेधन का ‘राज’ खुल ही जाएगा, उनको अपनी गलतफहमी दूर कर लेनी चाहिए। अव्वल तो संधि पर मुस्कराकर हस्ताक्षर करने वाले हमारे वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने ही साफ कर दिया है कि इस संधि के तहत भारत व स्विट्जरलैंड के बीच सूचनाओं का आदान-प्रदान होगा तो जरूर, पर सीमित मात्रा में ही। अतः जरूरी नहीं कि वह हमें सूचनाएं मुहैया कराएगा ही। उन्होंने कहा है कि स्विट्जरलैंड एक संप्रभु देश है और वहां के कानून ऐसे हैं, जिनके कारण स्विस बैंक लेन-देन का ब्यौरा दे ही नहीं सकते। ‘धन्य’ हो गया भारत प्रणब मुखर्जी के मुंह से यह ‘ज्ञान’ पाकर कि स्विट्जरलैंड एक संप्रभु देश है और वहां के कानून कैसे-कैसे हैं?
इसके बाद भी जिन लोगों को कालाधन वापस आने की खुशफहमी हो , वे यह भी जान लें कि प्रणबदा ने जो कुछ कहा है, वह वही है, जो स्विट्जरलैंड की सरकार हम से आए दिन कहती रहती है। यानी, दादा गए थे यह डींगें हांककर कि स्विट्जरलैंड को भारतीयों के कालेधन की सूचनाएं देने के लिए बाध्य कर ही देंगे, पर जब लौटे, तो उसी की भाषा बोलते पाए गए। वे कर-संधि पर हस्ताक्षर जरूर कर आए, पर ऐसा कुछ नहीं कर सके, जिससे कालाधन वापस आने की थोडी-सी उम्मीद भी हुई हो। याद करें, तो स्विट्जरलैंड ने अपने कानूनों का झुनझुना अमेरिका के सामने भी बजाया था, पर जब ओबामा ने हुंकार भरी कि हमें स्विस-कानूनों के बारे में कुछ नहीं जानना है, बल्कि यह जानना है कि वहां के बैंकों में अमेरिका के कितने कर-चोरों या भ्रष्टाचारियों का धन जमा है, तो स्विस हुकूमत भीगी बिल्ली बन गई थी।
अब होता यह है कि स्विस विदेश मंत्री मिशेलिन कामी रे हर महीने अमेरिका जाते हैं और खातेदारों की एक सूची अमेरिका को सौंप आते हैं। जिस दिन कर -संधि पर प्रणबदा व उनके हस्ताक्षर हुए, उसके ठीक एक दिन पहले ही वे अमेरिका से लौटे थे, उसके साढे तीन सौ खातेदारों की सूची सौंपकर। यानी, अमेरिका के लिए स्विस-बैंकिंग कानून शिथिल हैं, तो भारत के लिए प्रभावी, क्योंकि भारतीय नेता ओबामा जैसी हुंकार नहीं भर पाते। भरें भी तो कैसे? यह डर भी तो है कि कालेधन के डिब्बे का ढक्कन खुले, तो उसमें से हम भी न निकल पडें। ऐसे लोग स्विस बैंकों से भारतीय कालाधन वापस लाएंगे, यह हमारा मुगालता ही है। |
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