| | महसूस करो भूखों मरते लोगों का दर्द | | | |
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हमारे सत्ताधीशों की संवेदनाओं को झकझोर पाना आसान काम नहीं है। जिनके पेट कभी खाली रहे ही न हों , वे भूख से बिलबिलाते लोगों की पीडा को महसूस करें भी, तो कैसे? सुना है कि इस वक्त दुनियाभर के गोदामों में 17 करोड 50 लाख टन गेहूं जमा है, जबकि इसका 44 प्रतिशत यानी सात करोड 80 लाख टन भारत और चीन के गोदामों में है। अकेले भारत के सरकारी गोदामों में चार करोड 25 लाख टन गेहूं जमा है। इस बार यहां इतना हुआ है कि उसे रखने की जगह नहीं मिल रही है और उचित भंडारण नहीं होने से वह खुले में पडा-पडा सड रहा है। सवाल यही है कि अगर निगम के पास गोदाम नहीं हैं, तो जरूरत से ज्यादा अनाज खरीदने की जरूरत क्या है? यदि खरीदा है, तो उसे आम जनता में बांट दें, तो कृषि मंत्रालय को क्या फर्क पडेगा?
हम क्यों भूल जाते हैं कि यह वही कृषि प्रधान देश है , जहां धरती सोना उगला करती है। वह अनाज के रूप में हीरे-मोती उगलती है, पर व्यवस्था की असंवेदनशीलता के कारण इसी देश में करोडों लोग भूखे पेट भी सोते हैं। अनाज सड सकता है, पर वह गरीबों के पेट तक नहीं पहुंच सकता। दरअसल, अन्न की बर्बादी वही लोग कर सकते हैं, जिनके कुत्ते-बिल्लियों को भी दूध-दही मिलता है। उन्हें अपने बंगलों के बाहर किसी पेड के नीचे मजदूर का भूखा बच्चा क्यों दिखेगा? हमारे शास्त्रों और पुराणों में अन्न को देवता कहा गया है। अन्न उगाने वाली धरती को अन्नपूर्णा, तो खेतों में श्रम करने वाले किसानों को अन्नदाता।
एक समय था , जब भारतीय संस्कारों में भोजन के बाद थाली धोकर पी ली जाती थी, ताकि अन्न का कोई दाना बर्बाद न हो। घर की रोटी में से एक रोटी गाय, कुत्ते और अतिथि (मांगने वाले) के लिए नियमित निकाली जाती थी। अन्नदान के लिए विख्यात देश में आज मानसिकता इतनी विकृत कैसे हो गई कि सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का भी मान नहीं रहा? हम भूल जाते हैं कि हरित क्रांति करने वाले देश में कालाहांडी आज भी मौजूद है। देश के सर्वोच्च न्यायालय का धन्यवाद करना चाहिए कि वह संवेदनशील है। भले ही न्याय की देवी की आंखों पर पट्टी बंधी हो, पर दिल भूखे पेट और सडते अनाज के दर्द को महसूस कर रहा है। न्यायालय आदेश देकर कहता है कि अगर अनाज यूं ही खुले में सडता है, तो उसे गरीबों में बांट दो, पर न जाने क्यों नीति-नियंता सुप्रीम कोर्ट के आदेश को सलाह मानकर कहते हैं कि सलाह लागू नहीं की जा सकती? तब न्यायालय को स्पष्ट करना पडता है कि हमने सलाह दी कब थी? हमने तो आदेश दिया था। आंकडों की मानें, तो सिर्फ 11 हजार सात सौ टन अनाज बर्बाद हुआ है, पर देश के कृषि मंत्रालय के नियंत्रण में चलने वाले भारतीय खाद्य निगम के आंकडे कहते हैं कि 2008 से 2010 तक 35 मीट्रिक टन अनाज भंडारण की सुविधाओं की कमी के कारण बर्बाद हो गया है।
आखिर , ये लोग किस मिट्टी के बने हैं, जो गोदाम नहीं होने पर भी जरूरत से ज्यादा अनाज किसानों से खरीद लेते हैं? यदि यही अनाज खुले बाजार में आता, तो महंगाई से जूझते जरूरतमंद लोगों को कुछ तो राहत मिलती ही। भारत एक लोकतांत्रिक देश है। यहां का शासन जनता का, जनता के लिए, जनता के द्वारा संचालित है। अतः अगर जनता का अनाज उसी को लौटा दिया जाए, तो कोई बवाल नहीं मच सकता। यदि देश में लोकतंत्र है ही, तो व्यवस्था में लोकतांत्रिक गुणवत्ता भी होनी चाहिए। ‘तंत्र’ को ‘लोक’ की चिंता करनी चाहिए। लोक भूखों मरे और तंत्र अनाज सडा दे, तो स्थिति लोकतंत्र-विरोधी ही मानी जाएगी। ऐसा भी नहीं है कि तंत्र भुखमरी से अनजान है। स्वतंत्रता दिवस के दिन लाल किले की प्राचीर से देश के तंत्र के मुखिया प्रधानमंत्री ने स्वयं कहा था कि आजादी के 63 साल बाद भी हमारी आबादी का बडा हिस्सा लगातार गरीबी-भूख और रूग्णता का शिकार बना हुआ है। उन्होंने ही यह आश्वासन भी दिया था कि सरकार खाद्य सुरक्षा का ताना-बाना विकसित करना चाहती है, पर यह कब तक होगा? क्या खाद्य सुरक्षा विधेयक आने तक गेहूं को सरकारी गोदामों में यूं ही सडने दिया जाए?
इधर , मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुझाए गए अल्पकालिक उपायों के अनुरूप सुरक्षित भंडारण के अभाव में बर्बाद हो रहे खाद्यान्न को जरूरतमंद गरीबों में तत्काल मुफ्त वितरित करने का आग्रह किया था। उन्होंने प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में कहा कि यह एक विडंबना ही है कि भारतीय खाद्य निगम द्वारा उपार्जित अन्न सडता रहता है, जबकि देश की आबादी के एक बडे हिस्से को खाद्य सुरक्षा की जरूरत है। उन्होंने कहा कि सड रहे खाद्यान्न की समस्या से निपटने के लिए भारत सरकार गरीबी रेखा से नीचे की जनसंख्या के लिए खाद्यान्न की मात्रा बढाने, महीने में तीसों दिन उचित मूल्य की दुकानें खोले रखने और जरूरतमंद लोगों को अत्यंत कम मूल्य पर या मुफ्त में खाद्यान्न का वितरण करने जैसे तात्कालिक उपाय लागू कर सकती है। मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री को लिखा कि भारत सरकार केवल 41.25 लाख परिवारों को ही गरीब परिवारों की श्रेणी में मानती है, जबकि सर्वेक्षण व रिकार्ड के मुताबिक मध्यप्रदेश में गरीब परिवारों की वास्तविक संख्या 67.59 लाख है। इसी कारण राज्य सरकार केवल 20 किलोग्राम खाद्यान्न ही गरीब परिवारों को दे पा रही है, जबकि उन्हें 35 किलो खाद्यान्न मिलना ही चाहिए।
हमारे प्रदेश के संदर्भ में तेंदुलकर कमेटी ने भी यही माना है कि प्रदेश में गरीबी रेखा के नीचे जीवनयापन करने वाले परिवारों की संख्या 60 लाख से ज्यादा है। योजना आयोग के सदस्य सुरेश तेंदुलकर की अध्यक्षता में गठित कमेटी ने अपने प्रतिवेदन में मध्यप्रदेश में 48.6 फीसदी नागरिकों को निर्धन बताया है। बहरहाल, अनाज उस देश में सड रहा है, जिसमें ‘ग्लोबल हंगर इंडेक्स’ के अनुसार दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले सबसे ज्यादा लोग भूख के शिकार हैं। यह अनाज उस देश में सड रहा है, जहां 48 फीसदी बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, 30 फीसदी बच्चे जन्म के समय कम वजन के पैदा होते हैं और हर साल 15 लाख बच्चे कुपोषण के कारण दम तोड देते हैं।
खाद्य सुरक्षा विधेयक आए या न आए , पर इस देश में यह मार्मिक दृश्य हम सबने देखा ही होगा कि किसी भोजन समारोह के बाहर फेंकी गई जूठी पत्तल-दोनों पर चील, कौवे, कुत्ते, सूअरों के साथ-साथ इनसान भी जूठन खाते हैं। यह वही अन्नपूर्णा का देश है, जहां पंगत (पंक्तिबद्ध भोजन) शुरू करने से पहले ‘नमः पार्वती पते हर-हर महादेव’ का मंत्र बोला जाता है। जहां छोडे हुए भोजन को भी एकत्र करके गाय, बकरी के सामने रखा जाता है। ऐसे देश में लोगों का भूखों मरना शर्मनाक है और इससे भी ज्यादा शर्मनाक यह है कि सडते हुए अनाज को गरीबों के पेट तक नहीं पहुंचाया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश से बचने के लिए बहाने ढूंढे जा रहे हैं। अन्न सडाना उसका अपमान है। जगन्नाथ के देश में अन्न ही ‘नाथ’ है।
--डॉ . स्वाति तिवारी |
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