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प्रेतबाधा से भी खराब होती है साहब-बाधा
On 9/1/2010 7:40:17 PM

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कल जब चारों ओर से निराश हो पता नहीं कहां खोया था कि तब अखबार में एक बाबा की घोषणा पढी, तो डूबते को तिनके का सहारा मिल गया। बाबा ने सहर्ष घोषणा की थी कि जब कहीं न मिले समाधान, जब बंदा हर ओर से हो जाए परेशान, तो हमसे घर बैठे ले फोन पर समाधान! प्रेम बाधा, गृह बाधा, पर-पत्नी बाधा यानी हर बाधा से मुक्ति और जुए, सट्टे, झूठे कोर्ट केस आदि में जीतने के लिए संफ करें। हर बाधा का इलाज स्टांप पेपर पर लिखित गारंटी के साथ। पता करते-करते उनकी दुकान पर पहुंचा, तो भीड देखकर परेशान हो गया। यार, इस देश में तो बाधा भी बाधा की मारी है। खैर, मेरी बारी आई, तो मैंने उनके आगे घुटने टेके। उन्होंने पूछा-बोल क्या चाहता है? प्रेम विवाह का इच्छुक है? अभी करा देता हूं। चार-चार बीवियों वालों के भी कराए हैं, मैंने। तू सही चौखट पर आया है, बच्चा!

नहीं बंगाली बाबा! मेरे से तो एक पत्नी ही नहीं संभाली जा रही। एक विवाह करके ही पछता रहा हूं। अब तो लिव इन रिलेशन के बार में सोच रहा हूं। बाबा ने मोर पंख के पंखे से मेरे शरीर को छूते हुए फिर पूछा-क्या सरकारी बंदा है?

हां-मैंने जरा मायूसी के साथ यह शब्द बोला।

तो क्या दफ्तर में तेरे प्यार पर कोई और डाका डाल रहा है?

मैंने कभी इस बारे में सोचा ही नहीं बाबा! जो मातहत यह सोचने की गलती करता भी है, उसके खिलाफ बिना चार्ज के चार्ज शीट बन जाती है। वैसे भी पत्नी के प्यार तले ही इतना दबा रहता हूं कि किसी और के भार को उठाने की सोच ही नहीं पाता।

कुछ देर तक धमाचौकडी करने के बाद हुंकार भरते हुए बाबा फिर बोले-तो कारोबार में आई रुकावट से मुक्ति चाहता है?

नहीं बाबा! कारोबार है, तो नफा-नुकसान तो चलता ही रहता है। होता है, उसमें कभी-कभी नुकसान, तो कभी-कभी फायदा।

तो यहां किसलिए आया है? मुझे उल्लू बनाने?

मैं तो खुद उल्लू बन भटक रहा हूं, बाबा! उल्लू भी रात में तो देख ही लेता है, पर मुझे तो रात में भी कुछ नजर नहीं आता।

तो क्या चाहता है बोल? क्या समस्या है तेरी?

मैं साहब-बाधा से मुक्ति चाहता हूं। इस बाधा के चलते महीनों से दफ्तर जाने की हिम्मत ही नहीं हो रही। विदाउट पे चल रहा हूं-मैंने कहा, तो वे मुझे एक किनारे ओट में ले जाकर मेरे आगे दोनों हाथ जोडते हुए बोले-सच मान मेरे बाप! इसी बाधा के कारण तो मुझे नौकरी छोडकर यह काम करने को विवश होना पडा। साहब बाधा और साहबों से इस देश को उस रोज मुक्ति मिलेगी, जिस रोज यहां कोई साहब नहीं होगा, सभी मातहत होंगे। फिर देखना, देश कहां जाता है? हिम्मत है, तो साहब का सामना कर।

नहीं कर पाया तो?

तो मेरे साथ बैठ जा। सरकारी नौकरी के बाद सबसे अधिक मजे इसी धंधे में हैं। जनता को उल्लू बनाने में तो तुम माहिर हो ही! इसलिए तुम्हें इस कार्य में दिक्कत भी नहीं आएगी।

तो क्या कहते हैं, आप? मैं बाबा का चेला बन जाऊं?

--डॉ. अशोक गौतम

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