| | कैसे आगे बढेगी जीएसटी की गाडी? | | | |
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वस्तु एवं सेवाकर (जीएसटी) की जो गाडी 2010 से अटकी है, उसे वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने अप्रैल 2011 से देश की अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था की पटरी पर दौडाने के जितने प्रयास किए, वे अंततः अधूरे ही रह गए। संविधान संशोधन विधेयक लाकर इसका रास्ता साफ करने की केंद्र सरकार की मंशा भाजपा की सरकार वाले राज्यों के साथ तमिलनाडु और उत्तरप्रदेश सरकारों की असहमति के चलते पूरी नहीं हो सकी। मामले को टाल दिया गया है। देश की कर-व्यवस्था में बदलाव के लिए लाए जाने वाले जीएसटी व प्रत्यक्ष कर संहिता, दोनों ही ऐसे बडे सुधार हैं, जिनमें जल्दबाजी के परिणाम अच्छे नहीं होंगे। ये दोनों ही ऐसे दीर्घकालीन नीतिगत उपाय हैं, जिन पर समग्रता से विचार जरूरी है। नए प्रस्तावों को लागू करते समय हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि राज्यों में बिक्री कर की व्यवस्था को बदलकर मूल्य-वर्धित कर (वैट) व्यवस्था लागू हुए अभी पांच वर्ष ही हुए हैं और नया जीएसटी इसी व्यवस्था की अगली कडी है।
यह मौजूदा कर -व्यवस्था की जटिलता के साथ करों के बोझ को कम करने वाला प्रस्ताव है। अतः इस विषय पर पहले केंद्र के प्रयासों व राज्यों की आपत्तियों का जायजा लेना उचित होगा। केंद्र सरकार विश्व में अन्य देशों में सफलता पूर्वक चल रही वस्तु एवं सेवाकर की जिस व्यवस्था को अपनाना चाहती है, उसका उद्देश्य करों की संख्या को कम कर उनकी दरों में कमी लाने के साथ उसमें एकरूपता लाना भी है। जब इस संबंध में 2010 के मसौदे पर आम सहमति नहीं बनी थी, तब वित्त मंत्री प्रणबदा ने जुलाई के अंतिम सप्ताह में जीएसटी की एकल दर के लिए तीन साल का एक ऐसा खाका प्रस्तुत किया था, जिसमें आखिरी साल के लिए एक समान आठ प्रतिशत की दर का प्रस्ताव था। कर की दरों पर असहमति कम होने पर इस एकीकृत अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था का दूसरा बडा पेंच जीएसटी परिषद अध्यक्ष के नाते वित्त मंत्री को परिषद के सामूहिक निर्णय पर वीटो करने का अधिकार था। राज्यों की इस आपत्ति पर भी केंद्र ने अपने हाथ खींचकर यह पूरी कोशिश की कि अप्रैल 2011 से अंततः जीएसटी व्यवस्था लागू हो जाए, पर यह कार्य संभव न हो सका।
मूलतः राज्यों की चिंता अपनी वित्तीय स्वायत्तता में केंद्र के हस्तक्षेप को लेकर अधिक लगती है और यह अब केंद्र -राज्य वित्तीय संबंधों से जुडा मामला अधिक लगता है। शायद इसीलिए राज्यों ने इस हेतु प्रस्तावित संविधान संशोधन को समझने के लिए समय मांगा है। वैसे देश की संघीय व्यवस्था में केंद्र-राज्य वित्तीय संबंधों की समीक्षा व संशोधनों के लिए वित्त आयोग की व्यवस्था है, पर जब भी किसी सुधार के तहत वित्तीय मामलों में केंद्र व राज्यों के बीच तालमेल की बात आती है, तब बदलती राजनीतिक परिस्थितियों को भी महत्व देना जरूरी होता है। इसी यथार्थ को समझकर वित्त मंत्री ने योजना को राज्यों की सहमति बनने तक टालने का निर्णय लिया है।
देश की कर -व्यवस्था में सुधार के संबंध में सबसे महत्वपूर्ण यह है कि जीएसटी और प्रत्यक्ष कर संहिता के माध्यम से केंद्र जो प्रयत्न कर रहा है, वे अपरिहार्य तो हैं, पर यह दुर्भाग्यपूर्ण लगता है कि देश की कर-व्यवस्था के मूल दोषों को दूर करने की दिशा में कुछ नहीं हो रहा है। कर-अपवंचन की समस्या हमारी कर-व्यवस्था की सबसे बडी चुनौती है। जीएसटी के रूप में प्रस्तावित सुधार इस दिशा में कितने कारगर होंगे, यह कहना अभी कठिन है? वैट लागू होने से यद्यपि इस दिशा में उम्मीद जागी है, पर मूल समस्या तो सुधारों के सफल क्रियान्वयन की है। इस संबंध में यह एक सकारात्मक तथ्य है कि आज हम तकनीकी दृष्टि से इतने सक्षम हो गए हैं कि यदि कर सुधारों की दिशा में इनका अधिकाधिक उपयोग किया जाए, तो इस क्षेत्र की समस्याएं आसानी से सुलझ सकती हैं। इस संबंध में जिस महत्वपूर्ण कार्य को करना आज जरूरी लगता है, वह राज्यों के साथ उद्यमियों और करदाताओं का भी विश्वास अर्जित करना है। वित्त मंत्री यदि जीएसटी में होने वाली देरी के शेष समय को इस प्राथमिक कार्य में लगाएं, तो जिस भी मसौदे पर सहमति होगी, उसमें राज्यों की ही नहीं, उद्यमियों और करदाताओं की भी सहमति जरूर बनेगी। देखना है, प्रणबदा क्या करते हैं?
--डॉ . जीएल पुणतांबेकर |
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