सुप्रीम कोर्ट द्वारा मंगलवार को सीबीआई की संशोधन याचिका स्वीकार कर लिए जाने के बाद इस उम्मीद का दीया जगमगाने लगा है कि अब भोपाल के गैस पीडितों को न्याय मिलेगा। कितना मिलेगा और कब मिलेगा? जैसे सवालों को यदि हम थोडी देर के लिए भूल जाएं, तो संशोधन याचिका का स्वीकार किया जाना भी अपने आप में कोई छोटी-मोटी घटना नहीं है। अंतिम निष्कर्ष तो तभी निकाला जा सकेगा, जब सुनवाई पूरी हो जाएगी और सुप्रीम कोर्ट कोई निर्णय दे देगा, पर केशव महिंद्रा समेत सात अभियुक्तों के नाम जो नोटिस जारी किए गए हैं, उनको देखकर इस निष्कर्ष तक पहुंचने में कोई हर्ज नहीं होना चाहिए कि न्याय के सर्वोच्च आसन को अपनी उस चूक का अहसास हो गया है, जो उससे वर्ष-1996 में हो गई थी।
एक ऐसी भयानक दुर्घटना, जिसमें अब तक 15000 से ज्यादा लोग मारे जा चुके हों, हजारों लोग मर्मांतक पीडा झेल रहे हों, उसमें हम अपनी राजनीतिक जमात की कुत्सिक भूमिका को तो खैर देख ही चुके हैं, पर कहानी ज्यादा तभी बिगडी, जब 1996 में सुप्रीम कोर्ट ने गैस त्रासदी के खलनायकों के खिलाफ लगी धारा 304-(2) हटा दी और मुकदमा 304-ए के तहत चलाए जाने का फैसला सुना दिया। इसके बाद अभियुक्तों को गुनाह की तुलना में उचित सजा मिलने का रास्ता तो बंद हो ही गया था। यह भी एक त्रासदी ही है कि 1996 में इस बात का संज्ञान किसी ने नहीं लिया कि धारा 304-ए और 304-(2) में कितना अंतर होता है? न राजनीतिक बिरादरी ने और न उन्होंने भी, जो आज मुफ्त का यश लूटने की बेशर्म चेष्टा कर रहे हैं कि उन्होंने यह किया और वह किया, तब भोपाल के गैस पीडितों को न्याय मिलने की आशा हुई। गैस पीडितों की पीडा की भट्टी पर स्वार्थों की रोटियां सेंकने वाले लोग जरा इस सवाल का जवाब भी देते चलें कि 1996 में ये लोग क्यों सोते रहे थे?
सच तो यह है कि पिछले दिनों भोपाल की अदालत ने गैस कांड के अभियुक्तों को जब हल्की -फुल्की सजा सुनाई और देशभर में आक्रोश के स्वर उठने लगे, तब गैस कांड की हकीकत भी सामने आई। फिर, गैस पीडितों के संगठनों का संघर्ष भी नहीं भुलाया जा सकता। आज हमें इन दोनों बातों का नतीजा ही देखने को मिल रहा है। इसके लिए न्यायपालिका की सराहना की जानी चाहिए कि वह भूल सुधार के लिए आगे आई। इसके बाद भरोसा है कि भोपाल के अपराधी अपने किए की सजा जरूर पाएंगे। |