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कहा जाता है कि दुनिया में चीन के बाद भारत ही दूसरा वह देश है , जिसकी अर्थव्यवस्था तेजी से विकास कर रही है। अभी तीन दिन पहले की ही बात है, जब हमारी विकास दर (जीडीपी) के आंकडे आए थे। पता चला था कि चालू वित्तवर्ष की दूसरी तिमाही में हमारी जीडीपी की दर 8.8 फीसदी रही है, तो हमारे भाग्यविधाताओं के होठों पर मुस्कान भरत-नाट्यम करने लगी थी, पर जरा रुकिए। इस सिक्के का दूसरा पहलू भी है। बीते रोज विश्व बैंक ने भी अपनी रिपोर्ट जारी की है। उसमें बताया गया है कि भारत विश्व बैंक का सबसे बडा कर्जदार देश है। मैक्सिको का स्थान दूसरा है। हालत यह है कि हमने अपनी तमाम विकास योजनाओं के लिए वित्तवर्ष-2009-10 में ही करीब नौ अरब डॉलर का कर्ज लिया था। इसमें सभी पुराने कर्जों को जोड दें, तो आंकडा तीस अरब डालर के आसपास जा पहुंचता है। फिर, पांच अरब डालर के लिए अभी हम उसके सामने कतार में खडे ही हैं। इधर, अन्य वैश्विक वित्तीय संस्थाओं से भी हमने धडाधड कर्ज लिया है अथवा ले रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष, अंतरराष्ट्रीय कृषि विकास फंड, एशियाई विकास बैंक और विश्व बैंक की सहायक संस्था अंतरराष्ट्रीय विकास ऐसोसिएशन से भी हमने अरबों डालर का कर्जा ले रखा है। फिर, जापान, कनाडा, अमेरिका और फ्रांस से भी हम समय-समय पर कर्जा लेते ही रहते हैं।
यानी , तस्वीर यूं बनती है कि अपना देश कर्जा लेने के मामले में विकसित और गरीब देश, दोनों से आगे है। फिर, कर्जा लेकर चलाई जा रही विकास योजनाओं में भ्रष्टाचार भी खूब हो रहा है। इस मामले में भी हम अव्वल हैं। अतः ऐसी विकास दर का देश क्या करेगा, जो महंगाई बढाकर और कर्जा लेकर सातवें आसमान पर केवल इसलिए पहुंचाई जा रही है, ताकि और कर्जा मिलता रहे? क्या विश्व बैंक की रिपोर्ट हमारी आंखें खोल पाएगी? |