फिल्मों के जरिये हिन्दुस्तान में नये-नये फैशन लाने का इतिहास भले ही पुराना हो,लेकिन यह श्रेय साधना शिवदासानी (जो विवाहोपरांत साधना नय्यर) को ही है कि उनके द्वारा प्रारंभ फैशन का दौर सबसे लंबा चला। याद करें ‘लव इन शिमला’ (1959)का वह दृश्य जब साधना कट हेयर स्टाइल में नजर आती हैं। इसके बाद ‘एक फूल दो माली’ फिल्म से गरारा फैशन में आया। ये दोनों फैशन साधना ही लाईं। आज उम्र के लगभग सत्तर वें दशक में वे तन्हा हैं। उन्होंने बडे परदे पर सदैव एक आकर्षक स्त्री या कहें कि लुहावनी प्रेमिका की छवि पेश की। ऐसा लगता था सेल्यूलाइड पर कोई कांच की गुडिया आ गई हो या मोम की बनी कोई आकृति हमारे समक्ष हो, जो हाथ लगाते ही कहीं मैली न हो जाए। वह किसी कुमुदिनी (व्हाइट लिली) की तरह दिखाई देती हैं।
साधना ने फिल्म ‘दूल्हा-दुल्हन’ (1964) में राजकपूर के साथ अपने अभिनय जीवन का यादगार चरित्र निभाया। इस फिल्म का मुकेश द्वारा गाया वह गीत ‘हमने तुमको प्यार किया है जितना, कौन करेगा इतना...’ भुलाए नहीं भूलता। साधना की मासूमियत भरी मुस्कराहट इस गीत की भावनाओं को पूर्णता देती है। रहस्यमयी भूमिकाओं और दोहरी भूमिकाओं के कारण भी साधना की पहचान बनी। वे फिल्म मेरा साया, अनीता, एक फूल दो माली, हम दोनों, वक्त और अमानत मैं बिल्कुल अलग नजर आती हैं। वक्त, हम दोनों, मेरे महबूब, अनीता, इश्क पर जोर नहीं, में देवानंद, राजेंद्र कुमार, मनोज कुमार, धर्मेंद्र के साथ नजर आती हैं, तो वो कौन थी (1964) में उसी रहस्य के साये में लिपटी स्त्री नजर आती है। फिल्म निर्माण के कटु अनुभव से गुजरने के बाद 1974 में साधना ने फिल्मों से किनारा कर लिया।
‘ गीता मेरा नाम’ को अपेक्षित कामयाबी न मिल सकी और स्वयं अभिनीत इस फिल्म में साधना को बढ रही उम्र का असर संभवतः महसूस भी हुआ, लेकिन उन्होंने बुजुर्ग और प्रौढ स्त्री की भूमिकाएं करना स्वीकार नहीं किया। हालांकि कई निर्देशक उनसे चरित्र भूमिकाओं का आग्रह करते रहे। साधना से कुछ वर्ष आर्ट्स क्लब, मुंबई में भेंट के दौरान किसी ने पूछा अब परदे पर नहीं आना चाहेंगी, तब उन्होंने मुस्करा कर कहा ‘‘अब मेरी एक्टिंग पारी पूरी हो गई है।’’ गैर हिन्दी भाषी होते हुए भी उनकी हिन्दी का उच्चारण स्पष्ट, प्रभावी और चरित्र के अनुकूल होता था।
साधना को याद करते ही सिने प्रेमियों के मन में और स्मृतियों में गुलमोहर दहकने लगता है। वे साधना ही हैं, जिन्होंने गरिमामय ढंग से खुद को सिनेमा चलन से अलग किया। फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी और बॉयोग्राफी को नापंसद करने वाली साधना के व्यक्तित्व और कृतित्व पर लेखक ने सिंधी भाषा में एक कृति ‘सुहिणी साधना’ अर्थात सौंदर्य से परिपूर्ण साधना तैयार की है। यह कृति शीघ्र प्रकाशित होगी। -अशोक मनवानी |