| | जब डराया जा रहा है तो डरना ही होगा | | | |
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जब से स्वाइन फ्लू का प्रकोप फैला है , तब से हमारे मित्र मुंशीराम कुछ ज्यादा ही परेशान हैं। यह डर तो सताता ही रहता है कि कहीं स्वाइन फ्लू की चपेट में न आ जाएं, तो डर यह भी है कि ऑफिस के साथीगण कहीं उनके सामान्य-से सर्दी-जुकाम को ही स्वाइन फ्लू न समझ बैठें। दरअसल, मुंशीराम हमेशा छींकते और खांसते ही रहते हैं। जुकाम उनको हमेशा यूं जकडे रहता है, जैसे देश को भ्रष्टाचार, सज्जन आदमियों को पुलिस का डर और नेताओं को हमेशा चुनाव का भूत सताता रहता है। छींकने और खांसने के कार्य में मुंशीराम इतने निपुण हो गए हैं कि युवा होने के बावजूद इन दोनों कामों में उनका मुकाबला कोई बुजुर्ग भी नहीं कर सकता। 95 साल का वृद्ध भी नहीं।
अभी कल की ही तो बात है कि वे इधर ऑफिस में दाखिल हुए , तो उधर उनको आधा दर्जन छींकें भी एक साथ आ गईं। जानते हो, इसका उनकी सेहत पर कितना दुष्प्रभाव पडा? पूरे दिन उनका मन काम में नहीं लगा। उनकी छींक-गर्जना सुनकर दफ्तर की कर्मचारिणी मैना उनसे हाथ मिलाने नहीं आई। वह मैना, जो रोज हाथ मिलाती थी। आठ घंटे की ड्यूटी में कम से कम चार बार तो उनके पास आती ही थी और लंच टाइम में टिफिन भी शेयर करती थी। काम करने की ऊर्जा उनको मैना को देख-देखकर ही मिलती थी, पर सत्यानाश हो इस जुकाम का कि कल उसने मैना को उनके पास आने से रोक दिया। इसके बाद न ऊर्जा मिली, न उनका काम करने में मन ही लगा। ऊर्जा के बिना कैसे होता काम?
आज तो मुंशीलाल ऑफिस जाने से डर भी रहे हैं। न खांसी पीछा छोड रही है , न छींकें। पता नहीं कि आज मैना उनसे हाथ मिलाएगी भी या नहीं? साथी स्वाइन फ्लू का मरीज समझकर उनके साथ कोई उल्टी-सीधी हरकत न कर बैठें? कोई बॉस से न कह दे कि स्वाइन फ्लू का एक मरीज ऑफिस में है, तो कल पूरा ऑफिस भी मरीज बन सकता है? एकबारगी तो मुंशीराम को ख्याल आया कि आज ऑफिस से छुट्टी मार दी जाए, पर फिर इस ख्याल ने भी पकड लिया कि छुट्टी का कारण यह न मान लिया जाए कि मुझे स्वाइन फ्लू ने वास्तव में अपनी गिरफ्त में ले लिया है। नहीं...नहीं, ऑफिस तो जाना ही होगा, चाहे नतीजा कुछ भी निकले।
अब मुंशीराम धीरे -धीरे ऑफिस की ओर चले जा रहे हैं। उनकी स्कूटी सडक पर यूं चल रही है, जैसे अपने देश में जांचें चलती हैं। उनकी ओर यदि कोई देखता है, तो उन्हें लगता है कि सामने वाला उन्हें स्वाइन फ्लू का संदिग्ध मरीज मान रहा है। कलेजा बार-बार मुंह को आ रहा है, पर ऑफिस तो जाना ही होगा। जब डराया जा रहा है, तो स्वाइन फ्लू से डरना भी होगा। कैंसर से कौन डरता है, जिससे देश में हर साल 25 हजार से ज्यादा मौतें होती हैं? एड्स से भी कोई नहीं डरता, जिससे भी तीन हजार से ज्यादा इनसान तो प्रतिवर्ष मरते ही हैं। तपेदिक भी निगल जाती है, 15-20 हजार इनसानों को हर साल। मलेरिया से तो हर साल सबसे ज्यादा मौतें होती हैं, पर उससे कोई नहीं डरता। डर स्वाइन फ्लू से है, क्योंकि उससे डराया जा रहा है। इसीलिए मुंशीलाल डर भी रहे हैं।
--डॉ . आरके महाजनी |
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