| | देश में कैसे फैली सांप्रदायिकता? | | | |
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आतंकवाद का कोई धर्म या ईमान नहीं होता , पर शायद हमारे देश के सबसे सफल गृह मंत्री ऐसा नहीं मानते। हाल ही में उन्होंने बयान दिया कि देश में बढता भगवा आतंकवाद चिंता का सबब है। वैसे उनके इस बयान से उनकी अपनी पार्टी में ही फूट पड गई है, पर विचार करने योग्य बात यह है कि क्या सचमुच भगवा आतंकवाद जैसी कोई नई विचारधारा देश में जन्म ले भी रही है? जिस अभिनव भारत नामक संगठन का मालेगांव तथा अजमेर बम ब्लास्ट में नाम लिया जा रहा है, उसका संघ या किसी हिंदुत्ववादी संगठन से कोई नाता नहीं है। तब क्या सिर्फ हिंदुत्व की विचारधारा पर चलने वालों को भगवा आतंकवादी कहना उचित है? एक वर्ग विशेष के तुष्टिकरण हेतु बडी जनसंख्या को कठघरे में खडा करके सिर्फ सस्ती लोकप्रियता प्राप्त करना ही है, यह। हो सकता है कि गृह मंत्री जनता का ध्यान मूल समस्याओं से भटकाकर एक ऐसे मुद्दे की तरफ बांटना चाहते हों, जिसकी कोई तुक नहीं है।
अभी सितंबर में ही अयोध्या विवाद पर अदालत का फैसला आना है। क्या इससे देश में तनाव नहीं बढेगा ? हालांकि, अब 1992 जैसे हालात नहीं हैं, पर किसी अनहोनी से भी इनकार नहीं किया जा सकता। फिर धार्मिक मुद्दों पर तो वैसे भी जरा-सी चिंगारी ही आग बन जाती है। जिस भगवा आतंकवाद का जिक्र किया गया है, उससे संघ व भाजपा जैसे हिंदूवादी दलों पर ही सीधा निशाना साधा गया है। जिस आरएसएस को निशाने पर लिया गया है, उसमें देशभक्ति की कसमें खाने वाले ऐसे लोग हैं, जो अपना घर-द्वार छोडकर समाजसेवा करते हैं। गृह मंत्री के इस बयान ने उनकी देशभक्ति और समाजसेवा पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। भारत की स्वतंत्रता से पहले जो क्रांतिकारी देश के लिए शहीद हुए, वे भी कई बार भगवा चोला धारण किए दिखाई देते थे, तो क्या वे सभी आतंकवादी थे? कांग्रेस ने स्वयं भारत के राष्ट्रीय ध्वज में भगवा रंग स्वीकृत किया था, तो क्या एक वर्ग विशेष को छोडकर सभी भारतीय आतंकवादी हैं? चिदंबरम की मानसिकता पर तरस आता है कि उन्होंने अपनी विफलता को छिपाने के लिए भगवा आतंक का शिगूफा छोड दिया है।
नक्सलवाद के मुद्दे पर विफलता झेल रहे गृह मंत्री को शायद इससे लोकप्रिय होने की उम्मीद थी। हालांकि , कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव दिग्विजय सिंह ने इसका प्रतिकार किया है, पर इसलिए नहीं कि वे चिदंबरम के विचार से असहमत हैं, बल्कि इसलिए कि वे चिदंबरम से खुन्नस खाते हैं। यह तो वे भी मानते हैं कि देश में भगवा आतंकवाद है और इससे निपटने का सुझाव भी देते हैं कि संघ व भाजपा पर प्रतिबंध लगा दो। बहरहाल, दिग्विजय सिंह जो भी कहते हैं, कहने दो, पर एक जिम्मेदार राजनीतिज्ञ पी. चिदंबरम से इस तरह के बयान की देश को उम्मीद नहीं थी। देश में वैसे भी समस्याओं का अंबार लगा हुआ है, पर उन्हें सुलझाने की जगह वे भगवा आतंक को देश की सुरक्षा पर बडा खतरा बताने लगे।
देखिए , उनके इस बयान ने संसद की कार्यवाही को किस तरह बाधित कर दिया था? जहां देशहित-जनसरोकारों के मुद्दे प्रमुखता से उठने चाहिए, वहां भगवा आतंकवाद पर चर्चा हुई। आतंकवाद को बढाने में कांग्रेस की नीतियों की भूमिका कम नहीं रही। इंदिराजी की नीतियों ने भिंडरांवाला को शह दी, जिसका परिणाम आज तक सिख समुदाय भुगत रहा है। वैसे ही कांग्रेस मुस्लिम तुष्टिकरण को हवा देती रही है। जहां कहीं भी भगवा आतंकवाद के नाम पर बम धमाके हुए हैं, वे इसी मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति के परिणाम थे। राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद का जिन्न राजीवजी ने बोतल से बाहर निकाला था, जिसका खामियाजा देश आज तक भोग रहा है। भला क्या जरूरत थी, एक निचली अदालत के आदेश पर विवादित स्थल का ताला खुलवाने की? क्या उस फैसले के खिलाफ ऊंची अदालत में अपील नहीं हो सकती थी? राजीवजी ने इधर शाहबानो प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटकर मुस्लिम वोट बैंक पक्का करने की कोशिश की थी, तो उधर अयोध्या के विवादित स्थल का ताला खुलवाकर और मंदिर का शिलान्यास कराके हिंदू वोट बैंक। चिदंबरम जरा अपनी पार्टी का इतिहास पढ लें, तो उन्हें पता चलेगा कि देश में भगवा आतंकवाद जैसा कुछ नहीं है।
--सिद्धार्थ शंकर गौतम |
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