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अमेरिका अपनी गलती कभी नहीं मानेगा
On 9/2/2010 8:06:50 PM

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इराक में अमेरिका का आपरेशन फ्रीडमखत्म हो गया है। इसके बाद वहां अमेरिका के केवल पचास हजार सैनिक रहेंगे, जो इराकी सेना को प्रशिक्षित करेंगे तथा एक ऐसी सरकार बनवाने की कोशिश करेंगे, जिसमें शिया, सुन्नियों और कुर्दों का आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व होगा। यह बात तो तारीख में लिखी जाएगी कि अमेरिका ने इराक को तथाकथित फ्रीडमदिलाई या उसको तबाह किया? यह भी कि युद्ध में अंतिम हार अमेरिका की हुई या इराक की और यह भी कि घातक हथियार होने का झूठा आरोप लगाकर अमेरिका ने इराक को रौंद डाला, तो भी सारी दुनिया चुप बनी रही, तो क्यों? इधर तो विचार-विमर्श का मुद्दा दूसरा ही है और वह यह कि अमेरिका का चेहरा मानवीय कब होगा?

पता है, अपने देश के नाम संबोधन में बराक ओबामा ने क्या -क्या कहा? उन्होंने कहा है कि इराक में अमन कायम करने में अमेरिका ने सराहनीय योगदान दिया है। यानी, जिसको धिक्कारा जाना चाहिए था, ओबामा उस योगदानकी तारीफ करते पाए गए। इससे उन लोगों को धक्का लगा है, जो मानकर चल रहे थे कि इराक से सेना वापसी की घोषणा करते समय ओबामा यदि लज्जित नहीं होंगे, तो कम से कम उन करतूतों के लिए पश्चाताप के दो बोल तो बोलेंगे ही, जिनको इराक में अमेरिका ने अंजाम दिया है। उनसे यह उम्मीद अमेरिका के राष्ट्रपति के रूप में नहीं थी, बल्कि इसलिए थी कि यह वही ओबामा हैं, जिन्हें शांति का नोबेल पुरस्कार दिया गया है। ये वह ओबामा भी हैं, जो ह्वाइट हाउस में पहुंचने वाले पहले अश्वेत नेता कहे जाते हैं।

यदि अमेरिका का नोबेल पुरस्कार प्राप्त अश्वेत राष्ट्रपति भी इराक के खिलाफ बेमतलब का युद्ध छेडने को गलत कार्य नहीं मानता, तो इसका अर्थ यही है कि अमेरिका कभी नहीं सुधर सकता। ओबामा को अमेरिकी सैनिकों की शहादत को याद करते समय इतना तो याद रखना ही चाहिए था कि अमेरिका द्वारा थोपे गए युद्ध के कारण गैर-लोकतांत्रिक ही सही, पर एक हंसता-खेलता मुल्क बुरी तरह बर्बाद हो गया है। यह भी कि अभी तक सही गिनती भी पता नहीं चली है कि इस युद्ध में कितने इराकी मारे गए? फिर, इराक के विभाजन की बुनियाद भी अमेरिका ने लगभग रख ही दी। अतः यह धूर्तता भी याद रखने योग्य थी, पर ओबामा को यह सब बातें याद नहीं रहीं। दरअसल, अलग पार्टी के होने के बावजूद हैं तो वे बुश के उत्तराधिकारी और अमेरिका के राष्ट्रपति ही और यह मुल्क अपनी गलती कभी नहीं मानता।

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