कश्मीर के लिए जंग नहीं करेगा पाक*तलाक में पत्नी को देनी होगी आधी संपत्ति!*सख्ती के बाद गूगल ने साफ की साइट*फैसला निवेशकों के विश्वास पर आघात*एएसआई ने बालक का कान उखाड़ा*बेलगाम हुई जुबान*कैंसर से नहीं हारेगा युवी,जल्द मैदान में लौटेगा*रेप नहीं कर सका तो चलती ट्रेन से फेंका*पत्नी की हत्या कर शव फ्रिज में रखा*मतदाता सूची में नहीं है प्रिया दत्त की तस्वीर*
सबसे लंबे समय तक वनडे खेलने वाले क्रिकेटर बने सचिन
हाई प्रोफ्राइल सेक्स रैकेट चलाने वाली एक्ट्रेस अरेस्ट
सोशल नेटवकिंग साइट फेसबुक ने आठ साल पूरे कर लिए
शादी से पहले ही करीना कपूर के प्रेगनेंट होने की चर्चा?
मुख्यपृष्ठ राष्ट्रीय विश्व शहर  व्यापार खेल मनोरंजन शिक्षा सम्पादकीय क्लासिफाइड Appointment पत्रिकाएँ आज का पंचांग
हो भी सकता है सभ्यताओं में टकराव
On 9/3/2010 8:43:44 PM

Change font size:A | A

Print

E-mail

Comments

Rating

Bookmark

अमेरिका में अनेक मस्जिदें हैं, पर किसी को लेकर कोई विवाद नहीं है। तब सवाल उठता है कि न्यूयार्क में ग्राउंड जीरो के आसपास मस्जिद बनाने पर विवाद क्यों हो रहा है? इसके पीछे का इतिहास यह है कि 2001 में जब ओसामा बिन लादेन की प्ररेणा से आतंकवादियों ने अमेरिका पर हमला किया था, तब न्यूयार्क की दो सबसे ऊंची इमारतें धराशायी हो गई थीं। आतंकवादियों ने इस अमानवीय कृत्य को इस्लाम की जीत बताया था। इस घटना से सारी दुनिया सिहर उठी थी। अब अमेरिकी मुस्लिमों का एक वर्ग उसी के आसपास मस्जिद बनाना चाहता है। विवाद इसीलिए है।

2001 की घटना के बाद अमेरिका की राजनीति में एक नया मोड आ गया है। उसका प्रभाव दुनिया पर भी पड रहा है। दरअसल, मुस्लिम आतंकवादी समझने लगे हैं कि उन्हें दुनिया को ब्लैकमेल करने के लिए एक नया हथियार मिल गया है, जबकि समझदार मुस्लिमों में यह भय पैदा हो गया है कि अब ईसाई और मुस्लिम जगत के बीच संघर्ष बढेगा। कुछ वर्ष पहले अमेरिका के बहुचर्चित लेखक सैम्युअल पी. हंटिंगटन ने एक पुस्तक लिखी थी, जिसका नाम है द क्लैश ऑफ सिविलाइजेशन।पुस्तक का विचार यह है कि अब दुनिया की सभ्यताओं में टकराव पैदा होगा। सरल शब्दों में कहा जाए, तो मुस्लिम और ईसाई सभ्यता में संघर्ष तय है। हंटिंगटन ने जो लिखा, उस पर सारी दुनिया में चर्चा हुई। उदारवादी लोगों ने इसे केवल एक भय बताया था, पर संतुलित विचारधारा के लोगों का मत यह था कि हंटिंगटन ने ठीक ही लिखा है।

अब तक दुनिया में उपनिवेश कायम करने और अपना दबदबा बनाए रखने के लिए ही संघर्ष होता रहा है, पर अब जिस प्रकार से धार्मिक कट्टरता बढ रही है, उसे देखते हुए तो यही कहा जाएगा कि धर्म आधारित विचारों में संघर्ष तय है। यानी, ईसाई और मुस्लिम विचारधारा में टकराव होकर रहेगा। जो इसमें सफल होगा, भविष्य में उसी का दुनिया पर प्रभाव होगा। हम देख रहे हैं कि मुस्लिम और ईसाई जगत में संघर्ष चल रहा है। मुस्लिमों के पास केवल तेल की ताकत है, जबकि ईसाई जगत बौद्धिक आधार पर बहुत आगे है। इस संघर्ष में जो जीतेगा, वही दुनिया पर भविष्य में राज करेगा, ऐसा हंटिंगटन का मत है। न्यूयार्क में जिस स्थान पर वे दो विशाल भवन धराशायी किए गए, उस रिक्त स्थान पर मस्जिद का निर्माण कर दिया जाए, तो हंटिंगटन की भविष्यवाणी को दुनिया जल्द ही सच होता देखेगी। मस्जिद बनाने वालों का मत यह है कि उसके बनने के बाद अमेरिकी समाज में ईसाई और मुस्लिमों के बीच प्रेम बढेगा, पर हंटिंगटन इस विचार से सहमत नहीं हैं। उनकी ताजा पुस्तक हू आर वी?’ ने सारी दुनिया में धूम मचा रखी है। इस पुस्तक में वे लिखते हैं कि मुसलमान कभी सहयोग और सद्भाव का मार्ग अपनाने वाले नहीं हैं। इनका इतिहास कहता है कि पहले ये हिंसा फैलाकर जीतते हैं और फिर जीते हुए स्थान पर अपना विजय-चिन्ह बना देते हैं। ग्राउंड जीरो की मस्जिद भी इनकी जीत का चिन्ह ही कही जानी चाहिए।

लेखक अमेरिकियों से कहता है कि टकराव की राजनीति करने वालों को पहचानना जरूरी है। उनकी अनदेखी करने का नतीजा यह होगा कि अमेरिका में ईसाइयों और अन्य धर्मों के अनुयायियों का रहना मुश्किल हो जाएगा। यदि संक्षेप में कहा जाए, तो हंटिंगटन की राय में ग्राउंड जीरो पर मस्जिद का निर्माण गलत है। इसका अर्थ होगा, जिन्होंने अमेरिका पर वहशियाना हमला किया, उनके हौसले बुलंद करना। पाठक इस बात को जानते ही हैं कि अमेरिकी जनता हंटिंगटन को बहुत मानती है और उनके चिंतन से सहमत भी है। इसके प्रमाण भी देखने को मिल रहे हैं। वहां की अनेक संस्थाओं ने इस मामले में जनमत सर्वेक्षण कराए हैं, जिनके आकडे, बताते हैं कि अमेरिका की 65 प्रतिशत जनता ग्राउंड जीरो पर मस्जिद का बनना पसंद नहीं करती है, जबकि 35 प्रतिशत का कहना है कि यदि वहां मस्जिद बन भी जाए, तब भी लोगों को कोई आपत्ति नहीं होगी। इससे क्या नुकसान है?

ग्राउंड जीरो मस्जिद को लेकर बराक ओबामा भी अमेरिकियों के निशाने पर आ गए हैं। दरअसल, ओबामा ने मस्जिद का समर्थन तो नहीं किया, पर खुलकर विरोध भी नहीं किया है। उन्होंने कहा था कि अमेरिका में सबको अपने-अपने धर्म मानने की आजादी है। उनके इस बयान को मस्जिद समर्थक ही माना जा रहा है। इससे अमेरिकी नागरिकों के बडे वर्ग को लगने लगा है कि ओबामा को अमेरिका का भविष्य प्रिय नहीं है, बल्कि वे दुनिया में अपना कद बढाने के लिए ही मस्जिद पर गोलमोल बातें कर रहे हैं। ज्यों ही मस्जिद के निर्माण की बात प्रारंभ हुई, अमेरिका में यह सवाल फिर से उठ खडा हुआ कि ओबामा ईसाई हैं या मुसलमान? यदि यह सिद्ध हो जाता है कि उनका भीतरी मन आज भी अपने बाप-दादा के धर्म पर टिका हुआ है, तो अमेरिका की राजनीति में भूकंप आ सकता है। यह संयोग की बात है कि इधर ग्राउंड जीरो मस्जिद का मामला शुरू हुआ और दूसरी तरफ इस प्रकार के सर्वेक्षण प्रकाशित होने लगे कि ओबामा अब कितने लोकप्रिय हैं? हर पांच में से एक अमेरिकी अपने राष्ट्रपति को मुसलमान मानता है। अब ऐसे अमेरिकियों की संख्या बढ गई है, जो ओबामा को मुसलमान मानते हैं।

कुछ अमेरिकियों ने कहा है कि ओबामा के धर्म की जानकारी उन्हें मीडिया के जरिए मिली है। इसका तो यह अर्थ हुआ कि अमेरिकी जनता को अपने राष्ट्रपति के धर्म के संबंध में बहुत पहले से कोई निश्चित बात मालूम ही नहीं थी। आश्चर्य की बात तो यह है कि जो ओबामा के राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हैं, उन्हें भी उनके धर्म के बारे में सही जानकारी नहीं है। एक तिहाई से भी ज्यादा रिपब्लिकन नेता ओबामा को मुसलमान मानते हैं। चुनाव से पहले भी 20 प्रतिशत अमेरिकियों को विश्वास था कि ओबामा मुस्लिम हैं। ह्वाइट हाउस के प्रवक्ता ने इन अफवाहों का खंडन किया है और कहा है कि राष्ट्रपति ईसाई धर्म के प्रति पूरी तरह समर्पित हैं। कुछ लोग उनके बारे में अफवाहों का बाजार गर्म करके उन्हें जनता की निगाहों में गिरा देना चाहते हैं, पर मामला इतना सीधा भी नहीं है।

ऐसे डेमोक्रेटों की संख्या भी कम नहीं है, जो उन्हें मुसलमान मानते हैं। पार्टी को इस बात की चिंता है कि ओबामा का धर्म और ग्राउंड जीरो मस्जिद के प्रति उनका प्रेम आने वाले चुनावों में कठिनाइयां खडी कर सकता है। अब तो अमेरिका में यह भी पूछा जाने लगा है कि क्या ओबामा को राष्ट्रपति पद की दूसरी पारी मिलेगी? ग्राउंड जीरो पर अगर मस्जिद बनी, तो उसके कारण ओबामा भी हीरो से जीरो हो सकते हैं। इससे पूरी दुनिया के ईसाई भी मुसलमानों के बारे में खराब धारणा बनाएंगे, पर मस्जिद बनाने के अभियान में लगे इमाम फैसल अब्दुर्रऊफ को इन बातों से कोई मतलब नहीं है। समझ में नहीं आता कि उनको ग्राउंड जीरो पर मस्जिद बनाने की खुरापात सूझी ही क्यों? वे हंटिंगटन की भविष्यवाणी सच सिद्ध कर देंगे।

--मुजफ्फर हुसैन

Post Comments
More News
राजनीति ने कर दिया रेलवे को ...
भ्रष्टाचारजी का बड़ा भाई है ...
मानवीय सरोकारों से रिक्त होत...
सरकार इतराए न, बस राहत की सा...
‘प्रचंड’ वैभव नेपाल की क्रां...
 सम्पर्क करें  विज्ञापन दरें आपके सुझाव संस्थान
© Copyright of Rajexpess 2009,all right reserved.
Developed & Designed By: