|
घोटाला ‘कॉमन वेल्थ’ (जनता के पैसे) का ही होता है। राष्ट्र की संपत्ति अपनी संपत्ति जो है। चाहे तो इसे अपनी जेब में रख लो या घर ले जाओ, आपकी मर्जी। ‘राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट’ की तर्ज पर जिसे देखो, वही कॉमन वेल्थ लूट रहा है। नेता, ठेकेदार, अफसर, इंजीनियर, सभी बहती गंगा में हाथ धो रहे हैं। करोडों के खेल में लाखों भी हाथ लग जाएं, तो क्या गम है? क्या पता, ऐसा मौका फिर आए या न आए?
कुछ नासमझ लोग लगे कॉमनवेल्थ गेम्स के निर्माण कार्यों में मीन -मेख निकालने। खेल मंत्री ने बजा फरमाया-खूबियां तो देखिए साहब, कितने खूबसूरत स्टेडियम बनाए हैं, इंजीनियरों ने। जी हां, अक्खा दुनिया में नहीं मिलेगी, ऐसी क्वालिटी। क्या कभी ऐसी छत देखी है, जो उद्घाटन करते ही टपकने लगे? यही तो कमाल है, कॉमनवेल्थ गेम्स के काम्प्लेक्स और ऑडिटोरियम की छतों का। इसे ही कहते हैं-‘एक पंथ, दो काज।’ लोग खेल देखते हुए बूंदा-बांदी का मजा भी उठा सकेंगे। ज्यादा पानी भरने पर तैर भी सकते हैं। कपडे उतारे और लगा दी छलांग। खेल देखने के साथ तैराकी का आनंद। तब एक अनूठा अहसास और यादगार पल होगा, दर्शकों को लिए। जो लोग इसका आनंद उठाएंगे, वे खुद को धन्य समझेंगे और वंचित अपनी किस्मत को कोसेंगे।
हाय , हमारा जीवन व्यर्थ गया। न थी हमारी किस्मत कि इस पल का आनंद उठा पाते। हमारे इंजीनियरों व ठेकेदारों की तो लॉटरी ही खुल जाएगी। हुनर की बात निकलेगी, तो दूर तलक जाएगी। विदेशों में चर्चे होंगे। डिमांड आएगी कि हमारे यहां भी बना दो उद्घाटन के समय टपकने वाली छत। मुंह मांगा दाम देंगे। टपकने वाली छतें बनवाने की होड लग जाएगी। कुछ लोग इस बात पर बिसूर रहे हैं कि जो कंपनी है ही नहीं, उसे तीन करोड 60 लाख दे दिए। आखिर, दरियादिली भी तो होती है, कोई चीज। जब सभी को बांट रहे हैं, तो भला किसी को कैसे डांट सकते हैं? भले ही कंपनी न हो, पर पैसे किसी न किसी को तो मिल ही रहे हैं न।
कुछ लोगों को आयोजन समिति के अध्यक्ष कलमाडी की दाढी में तिनका नजर आ रहा है , तो कुछ ने उनका इस्तीफा ही मांग लिया। अब कलमाडी ठहरे भोले-भाले। ‘मैं नहीं माखन खायो’ की तर्ज पर बोले-स्टेडियम मैंने नहीं बनवाए, फिर मैं घपले कैसे रोक सकता हूं। बिलकुल सही कहा। किसी के पेट पर लात कैसे मार सकते हैं? जैसा हमारा धंधा, वैसा तुम्हारा धंधा। कई लोग राजनीति का धंधा चमकते ही मंत्री बनने का ख्वाब देखने लगते हैं, पर कलमाडी को मंत्री पद का मोह नहीं। वे तो वर्षों से ओलिंपिक संघ के अध्यक्ष पद पर कुंडली मारकर बैठे हैं। न पैसे का कोई हिसाब-किताब, न कोई टांग खींचने वाला। वह तो बुरा हो मीडिया वालों का, जो राष्ट्रमंडल खेल का खेल बिगाड दिया। शहरी विकास मंत्री रेड्डी के तो कहने ही क्या? बोले-नुक्स निकालने की बजाय खुश होना चाहिए कि देश में कॉमनवेल्थ गेम्स हो रहे हैं। वाह, क्या खेल भावना है। ऐसी खेल भावना सबमें जागृत हो जाए, तो घपले-घोटालों पर शोर क्यों मचे? खेल भावना विकसित करो।
-- टीकाराम साहू ‘आजाद’ |