| | कांग्रेस में स्थापित हो आंतरिक लोकतंत्र | | | |
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सोनिया गांधी एक बार फिर कांग्रेस अध्यक्ष बन गईं। सही है कि देश की इस सबसे बडी राजनीतिक पार्टी के 125 वर्षों के इतिहास में सोनिया पहली नेता हैं, जो चौथी बार अध्यक्ष बनी हैं। इससे पहले यह सौभाग्य और किसी को प्राप्त नहीं हुआ। सच यह भी है कि वे कांग्रेस की सफलतम अध्यक्ष हैं। वे वर्ष-1998 में कांग्रेस की पहली बार अध्यक्ष तब बनी थीं, जब कुछ जल्दबाज राजनीतिक विश्लेषक भविष्यवाणी करने लगे थे कि अब कांग्रेस का युग समाप्त हुआ। हमें पता ही है कि बाद में यह भविष्यवाणी झूठी साबित हुई। सोनिया गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस लगातार मजबूत होती गई। उनका व्यक्तित्व इस मायने में भी अनोखा है कि वर्ष-2004 में उन्होंने प्रधानमंत्री का पद ठुकरा दिया था, जबकि कांग्रेस के नेता चाहते थे कि वे देश का नेतृत्व करें।
जब हमारी संसदीय राजनीति में राजनीतिज्ञों की गिद्ध -दृष्टि केवल कुर्सी पर ही होती है, तब हाथ आया प्रधानमंत्री का पद डॉ. मनमोहन सिंह को सौंप देना त्याग का ही एक उदाहरण है। आज के अन्य राजनीतिज्ञों से ऐसे त्याग की उम्मीद करना रेगिस्तान में पानी की खोज करने जैसा काम ही है। बहरहाल, सोनिया में ढेरों खूबियां होने के बावजूद मानना यह भी होगा कि उनकी पार्टी यानी कांग्रेस आंतरिक लोकतंत्र की दिशा में एक कदम भी आगे बढने को तैयार नहीं है। सही है कि देश में एक भी राजनीतिक दल ऐसा नहीं है, जिसमें आंतरिक लोकतंत्र हो। भाजपा और वामदलों में है, पर दाल में नमक जितना। क्षेत्रीय राजनीतिक दलों की तो चर्चा करना ही बेकार है, क्योंकि वे सभी तो एक व्यक्ति या एक परिवार के इशारों पर चलने वाले लोगों के जमावडे से ज्यादा कुछ हैं ही नहीं, पर देश की सबसे बडी पार्टी कांग्रेस की यह बीमारी अब भारतीय लोकतंत्र के लिए असहनीय हो चली है।
सोनिया गांधी चाहें , तो कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र स्थापित कर सकती हैं। यदि कांग्रेस का कोई नेता उन्हें चुनौती देने के लिए आगे बढे, तो इससे वे या उनका परिवार तो राजनीतिक रूप से कमजोर हो सकता है, पर इससे कांग्रेस और देश का लोकतंत्र मजबूत ही होगा। दरअसल, आजाद भारत में कांग्रेस ने जो राजनीतिक लकीर खींची है, उसका अतिक्रमण एक भी दल नहीं कर सका है। देश ने केंद्र में गैर-कांग्रेसी सरकारें देखी हैं और ऐसी सरकारें विभिन्न राज्यों में अब भी हैं, पर चल सभी कांग्रेस द्वारा खींची गई लकीर पर ही रही हैं। यानी, कांग्रेस आंतरिक लोकतंत्र स्वीकार कर ले, तो बाकी दल भी इससे बच नहीं सकेंगे। |
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