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अव्वल तो यही बेहद शर्मनाक है कि 164 ट्रक और वह भी बारूद से भरे हुए राजस्थान से चलने के बाद यूं गायब हो गए थे, जैसे कचरे के ढेर में सुई। फिर, लज्जा का विषय यह भी है कि माओवाद, तरह-तरह के आतंकवाद, विदेशों से आ रही जाली मुद्रा की खेपों, मादक पदार्थों और हथियारों की तस्करी से जूझ रहे देश में इस घटना को उतनी भी गंभीरता से नहीं लिया गया, जितनी गंभीरता से पुलिस साइकिल चोरी की किसी घटना को ले लेती है, बशर्ते जिसकी साइकिल चोरी हुई हो, वह पुलिस के सामने गिडगिडाने लगे, कुछ चढावा चढा दे या किसी नेता आदि से फोन करा दे! यह सही है कि राजस्थान पुलिस ने इस घटना के दो आरोपियों, शिवचरण हेडा और दीपा हेडा को गिरफ्तार कर लिया है, पर मामले में इतने झोल हैं कि लगता नहीं कि इसका आसानी से पता चल जाएगा कि सैकडों टन बारूद आखिर गई, तो कहां? जमीन में समा गई या चंद्रमा पर चली गई?
झोल यह है कि कहा जा रहा है कि ट्रक भीलवाडा के जिस कारखाने से चले थे , उसका बारूद बनाने का लाइसेंस खत्म हो गया था और इधर सागर के जिस कारखाने के लिए भेजे गए थे, उसका लाइसेंस तो खैर खत्म हो ही गया था। कोई फैक्ट्री यदि लाइसेंस खत्म हो जाने के बाद भी बारूद का कारोबार करती रहे, तो मानने का मन नहीं होता कि इस गोरखधंधे की जानकारी उद्योग विभाग, देश की विस्फोटक नियंत्रक एजेंसी समेत संबंधित राज्यों यानी राजस्थान और मध्यप्रदेश पुलिस के कुछ कर्मचारियों को न रही होगी? लगता तो यही है कि कुछ शासकीय विभागों, ट्रक-कारखाना मालिकों और तस्करों-अपराधियों की व्यापक मिलीभगत का नतीजा है, बारूद का गायब होना। यहीं यह भी लगने लगता है कि यदि ये गठजोड तगडा हुआ, तो कुछ लोगों के पकडे जाने के बाद भी बारूद का अता-पता नहीं चलेगा! |