| | देश में विषमता का पौधा वृक्ष बन गया | | | |
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हमारी सरकार चीन के बाद सर्वाधिक तेजी से बढती अर्थव्यवस्था का दर्जा प्राप्त करके अत्यंत अभिभूत है। सन -2008 में विकसित राष्ट्रों में आई मंदी के बावजूद अर्थव्यवस्था की विकास दर को अपेक्षाकृत ऊंचा बनाए रखने की सफलता से उसे विश्वास हो गया है कि सन-1991 के बाद की अवधि में उदारीकरण की नीतियों के अंतर्गत जो कदम उठाए गए हैं, वे राष्ट्र के हित में हैं। विकास की ऊंची दर के आधार पर ही राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) सरकार के उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी ने शाइनिंग इंडिया का नारा दिया था, पर उसके तत्काल बाद हुए आम चुनाव में एनडीए को हार का मुंह देखना पडा था। हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री भी प्रथम कार्यकाल के बाद के आम चुनाव में अधिक प्रभावी विजय प्राप्त करने के बाद बेखौफ होकर पूंजीवादी आर्थिक नीतियां अपनाते जा रहे हैं।
वैसे तो उन्हें इन नीतियों के आम व्यक्तियों पर पडने वाले बुरे प्रभावों की कोई चिंता ही नहीं थी , क्योंकि उनका पूरा ध्यान विकास दर को अधिकतम बनाने पर केंद्रित है। फिर, अब तो जब राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना भी चल रही है, तब वे इन नीतियों के दुष्प्रभावों के बारे में निश्चिंत भी हो गए हैं। हां, नागरिकों की आय में बढती विषमता और कुछ वर्गों को विकास का कोई लाभ नहीं मिलने से देश में बढता असंतोष उनकी चिंता का कारण बन रहा है। आय की विषमता को कम करने में आयकर और अन्य प्रत्यक्ष करों की भूमिका महती होती है। 1991 के बाद की अवधि में देश में आयकर की दरों को कम करते-करते 30 प्रतिशत के अधिकतम स्तर पर लाया गया है।
आपकी आय आठ लाख के बाद कितनी भी अधिक क्यों न हो , आठ करोड हो या 80 करोड, आपको अधिकतम 30 प्रतिशत ही आयकर चुकाना है। यानी, आयकर की दर को अधिकतम 30 प्रतिशत पर ले आने का लाभ मुख्यतः पैसे वालों को ही मिला है। कर की दरों में कमी से पूंजीपतियों को मिलने वाले लाभ का अनुमान लगाते हुए प्रसिद्ध पत्रकार पी. साईनाथ ने लिखा है कि इस वर्ष के बजट में विभिन्न करों की दरों में कमी से पूंजीपतियों को 60 हजार करोड का लाभ मिल गया है। यह प्रक्रिया पिछले कई वर्षों से चल रही है। यहां पर इस तथ्य का उल्लेख सामयिक होगा कि हमारे संविधान में समाजवादी व्यवस्था कायम करने का लक्ष्य अपनी जगह पर यथावत है, पर उसी संविधान की शपथ लेकर भी हमारी सरकार पूंजीवादी राष्ट्रों से भी अधिक पूंजीवादी नीतियां अपना रही है। यही नहीं, सरकार ने विभिन्न बहानों से, जैसे-विशिष्ट आर्थिक क्षेत्र, विशिष्ट निर्यात क्षेत्र स्थापित करके, उनमें शुरू हुए उद्योगों को करों से पूर्णतः मुक्त कर दिया है। इनका लाभ लेने तथा करों के भुगतान से मुक्ति के लिए अनेक उद्योगों या उनकी सहयोगी इकाइयों ने अपने उद्योग इनमें स्थानांतरित कर दिए हैं।
पहले सरकार ने खाद्यान्न और अन्य आवश्यकता की वस्तुओं में वायदे के सौदों पर प्रतिबंध लगा रखा था , पर उदारीकरण के इन वर्षों में इन्हें भी वायदा बाजार के लिए खुला छोड दिया गया है। इसके कारण इन वस्तुओं की कीमतों में भारी वृद्धि हो रही है और सट्टेबाज भारी मुनाफा कमा रहे हैं। अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि इस वर्ष खाद्यान्नों की कीमतों में 18 प्रतिशत का उछाल इसी सट्टेबाजी का परिणाम है। फिर, सार्वजनिक वितरण प्रणाली में अनेक विकृतियों के चलते इससे भी गरीबों को खाद्य सुरक्षा नहीं मिल पा रही है। खनिज संपदा की बात करें, तो इस समय देश में प्रमुख खनिजों के दोहन के लिए 8400 लाइसेंस दिए गए हैं, पर कुल खदानों की संख्या 23400 है। यानी, 15 हजार खदानों से खनिजों का अवैध उत्खनन किया जा रहा है। झारखंड खनिजों की बहुलता वाला राज्य है। वहां के थोडे समय के लिए मुख्यमंत्री बने मधु कोडा ने खदानों को बेचकर कुछ माह में ही 4300 करोड की संपत्ति एकत्र कर ली।
इसी प्रक्रिया में अवैध कब्जा करने वाले पूंजीपतियों ने कितना कमाया होगा , इसकी कल्पना ही की जा सकती है। छत्तीसगढ सरकार ने खनिज संपदा से संपन्न आदिवासी क्षेत्र में भूमि से आदिवासियों को उजाडने और उस भूमि को पूंजीपतियों को सौंपने का काम किया। आदिवासियों को अपना ग्राम छोडकर तंबुओं में रहने को बाध्य किया गया और जो आदिवासी इसके लिए तैयार नहीं हुए, उनके मकान जला दिए गए। इस तरह खाली हुई भूमि को टाटा को लौह-खनन के लिए सौंप दिया गया। यही स्थिति कृषि भूमि की भी है। उद्योगों की स्थापना, विशिष्ट निर्यात क्षेत्र और विशिष्ट औद्योगिक क्षेत्रों के लिए किसानों से भूमि छीनी जा रही है। इसका दुष्परिणाम यह है कि कृषि विकास की दर गिरकर पिछले दो वर्षों में 1.2 और 0.2 प्रतिशत ही रह गई है। कृषि में कार्यरत व्यक्तियों की प्रति व्यक्ति आय इन वर्षों में गिरी है, जबकि अर्थव्यवस्था तेजी से बढ रही है। यही कारण है कि देश के कृषि प्रधान आठ राज्यों मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ, राजस्थान, बिहार, उडीसा, झारखंड, उत्तरप्रदेश और पश्चिम बंगाल में गरीबों की संख्या विश्व के सबसे गरीब देशों से भी अधिक है।
देश के आधे बच्चे कुपोषण के शिकार हैं और तीव्र विकास से इसमें कोई कमी नहीं आई है। आज देश में पांच में से दो महिलाओं को न्यूनतम आवश्यक पोषण भी नहीं मिलने से उनका वजन भी न्यूनतम आवश्यक वजन से कम है। अंतरराष्ट्रीय खाद्य नीति शोध संस्थान ने भूख के सूचकांक बनाए हैं। इनके अनुसार विश्व के 88 राष्ट्रों में भारत का स्थान 66वां यानी काफी नीचे है। सन-1991 में देश में प्रति व्यक्ति खाद्यान्न उपलब्धता 510 ग्राम थी, जो सन-2008 में 436 ग्राम ही रह गई है। ये सारे तथ्य चीख-चीखकर कह रहे हैं कि इन वर्षों में देश की ऊंची विकास दर से उत्पन्न आय पर केवल कुछ लोगों का कब्जा हो रहा है और गरीबों को उसका कोई लाभ नहीं मिला है। यही कारण है कि देश में इन वर्षों में राष्ट्रीय आय के वितरण में भी विषमता बढी है। इसी वजह से मानव विकास सूचकांक की दृष्टि से भारत का स्थान विश्व के राष्ट्रों में कुछ वर्ष पूर्व 124वां था, जो गिरकर अब 128वां हो गया है। आदिवासी आबादी को विकासजनित लाभ मिलना तो दूर, उसको उजाडा भी जा रहा है।
लिहाजा , पूरा आदिवासी क्षेत्र माओवादियों के प्रभाव में आ गया है। कुल मिलाकर हमारी विकास नीतियों का स्वरूप कुछ ऐसा है कि देश में अरबपतियों की संख्या वर्ष दर वर्ष बढती जा रही है, पर आम आदमी तो पूर्व की तरह ही शोषित और उपेक्षित है, जिसके कारण देश में जन-असंतोष बढ रहा है और अस्थिरता पैदा कर रहा है। समय आ गया है कि हम देश में अपनाई गई नीतियों की समीक्षा करें। सरकार को अपनी विकास नीतियों में परिवर्तन कर वास्तविक रूप से सर्वसमावेशी नीतियां अपनानी चाहिए, भले ही ऐसा करने से हमारी विकास दर में कमी आ जाए। वरना, देश में असंतोष फैलेगा और एक दिन ऐसा भी आएगा कि हमें अपनी नीतियां भी बदलनी पडेंगी।
- डॉ. रामप्रताप गुप्ता |
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