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इतिहास गवाह है कि हम किसी भी युग में सम्राटों , राजाओं, महाराजाधिराजों, बादशाहों, शहंशाहों और नवाबों के बगैर नहीं रहे। आज के युग में भी हम बिना नेताओं के नहीं रह सकते। यही हमारे शासक हैं। शासक सदा से सर्वगुण संपन्न माना गया है। सो, हमें नेताओं के सर्वगुण संपन्न होने पर शक नहीं करना चाहिए। इनमें गुणों का भंडार होते हुए भी एक अभाव यह है कि इन्हें शासन करना नहीं आता, बस। अधिकारी नाम का पवित्र, कर्तव्यनिष्ठ व समर्पित प्राणी इनकी सहायतार्थ उपलब्ध है। अंग्रेज भागे और भगाए भी गए। आजादी आई, मीठा फल लाई। किसी को एक मिला, किसी को टोकरे भर, तो किसी को ट्रक भर।
खबरदार जनसामान्य ! अधिक फल प्राप्त महानुभावों को ईर्ष्या या कोप की दृष्टि से न देखा जाए। अपने मुकद्दर का सब पाते हैं। सुना नहीं, भगवान छप्पर फाडकर देता है। वह आजकल छत फाडकर दे रहा है। आप चुपचाप देखिए, खुश होइए और हो सके, तो सदा की तरह ताली बजाइए। जरा सोचिए, अधिकारी नहीं होते, तो शासक को कौन बताता कि फाइल पर हस्ताक्षर कहां करना है? नोटशीट किसे कहते हैं? फाइल कैसे बढाई और रोकी जाती है? शासक चाहता है कि बस ऐसा हो। कैसे हो, इसे तो कार्यान्वित अधिकारी ही करता है। यानी, बिना अधिकारी के पत्ता भी नहीं हिल सकता। वह दिव्यशक्ति रखता आया है और आगे भी रखेगा। इसीलिए उसको ‘सर’ कहते हैं। सर का अर्थ यहां ‘महाशय’ से न लीजिए, बल्कि ‘सिर’ से लीजिए। सिर न हो, तो धड क्या करेगा? अतः हर स्थिति में अधिकारी के अधिकारों को जन्मसिद्ध मानकर उसकी गरिमा-महिमा को नमन करते रहिए।
किसी ने सच कहा है -सेवा करे, सो मेवा पाए। मैं उसे सफल अधिकारी ही नहीं मानता, जो अपनी कंचन कामिनी पत्नी के लिए दस हजार से कम की साडी न लाए, सौ-पचास तोला सोने से न लादे और आधा किलो हीरे-जवाहरातों से विभूषित न करे। हां, वे प्रशंसायोग्य हैं, जो इस साधारण उपक्रम के साथ मारवल और ग्रेनाइट से सजे बंगले-कोठियां भी बनवाते हैं। दो-तीन ट्रक सागोन या शीशम की लकडियों से दरवाजे बनवाते हैं। किसी-किसी के घर में सोना-जवाहरात रखने को जगह नहीं रहती, तो वे बैंक के लाकरों में ठूंसते हैं। अधिक प्रशंसनीय, बल्कि वंदनीय वे हैं, जिनके बडी संख्या में फार्म हाउस, कंपनियों व बडे प्रोजेक्टों में निवेश हैं और विदेशों तक में रसूख है। दावे से तो नहीं कह सकते, पर इतना जरूर है कि आ जाएं ब्रिटेन व अमेरिका के नेता और अधिकारी, तो इस क्षेत्र में भारत की ही मूंछ ऊंची रहेगी। अमेरिका के राष्ट्रपति आइजन हावर जिस जमाने में भारत आए थे और जब उन्हें पता लगा कि हमारे एक नेताजी की कुल संपत्ति तीन सौ करोड की है, तो वे भौचक्के रह गए थे। उन नेता की नाक का बाल कोई अधिकारी दस-बीस करोड में खेलता हो, तो क्या आश्चर्य? केरोसिन के लिए भटक रहे, अनाज के लिए तरस रहे, दवा के लिए रो रहे लोगों को चाहिए कि वे अपने लकडियों की तरह सूखे हाथ उठाकर नेताओं-अफसरों के फलने-फूलने की कामना करें।
- अहमद अली सिद्दीकी |