| | कहां चला गया है 872 टन बारूद? | | | |
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हालांकि , बारूद का सौदागर शिवचरण हेडा अपनी पत्नी सहित पकडा गया है, मैनेजर पकडा गया है, लाइसेंस खारिज हुआ है, पर एक रहस्य नहीं सुलझा। रहस्य यह है कि यह बारूदी धंधा कब से चल रहा था, कहां तक चल रहा था और जब अपने देश में राशन की दुकान तक बगैर राजनीति के नहीं चलती, तो बारूद का धंधा चलाने में कौन-कौन-से नेता मदद कर रहे थे? राजस्थान से लगभग 872 टन बारूद 164 ट्रकों में लादकर गंतव्य की ओर रवाना किया गया था, वह अचानक ही गायब हो गया। ट्रक की साइज इतनी छोटी भी नहीं होती है कि कोई उसे आसानी से छिपा सके। वैसे भी ज्वलनशील पदार्थों या बारूद ले जाने वाले ट्रकों की बनावट आम ट्रकों से अलग ही होती है। फिर 164 ट्रकों को आखिर कहां और कैसे गायब कर दिया गया? यह प्रश्न आज भी अनुत्तरित ही है।
भारत में आंतरिक व बाहरी तौर पर आतंकवाद , अलगाववाद, माओवाद आदि की आग आज जिस तेजी से सुलग रही है, उसे देखते हुए 872 टन बारूद का गायब हो जाना सामान्य घटना नहीं माना जा सकता। इस मामले को राजस्थान सहित छह राज्यों की पुलिस जिस हल्के तरीके से ले रही है, वह समझ में नहीं आता। देखा जाए तो सुरक्षा एजेंसियों की नींद इस तरह के संगीन और बडे मामले में उडना ही चाहिए थी, पर सब सो रहे हैं। दो माह से अधिक समय पहले हुई इस कथित चोरी के बाद पुलिस के हाथों खाली ट्रकों के अलावा कुछ नहीं लग सका। पुलिस और प्रशासन हैं कि एक-दूसरे पर जवाबदारी डालने पर तुले हुए हैं, जबकि इतनी भारी मात्रा में गायब हुआ बारूद देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए बहुत बडा खतरा बन गया है। गौरतलब है कि गत दिनों सूरत में हुए विस्फोट में राजस्थान के ही धौलपुर के मचकुंड के पास 1979-80 में स्थापित राजस्थान एक्सप्लोसिव व केमिकल लिमिटेड (आरईसीएल) बारूद फेक्ट्री में बने विस्फोटक और डेटोनेटर के इस्तेमाल की ही पुष्टि की गई थी, पर उस समय इसको भी गंभीरता से नहीं लिया गया था। यदि राजस्थान पुलिस तभी जाग जाती, तो शायद अब 164 ट्रक विस्फोटक भी गायब नहीं होता।
राजस्थान पुलिस अब जांच कर रही है कि कितना माल वहां से निकला और कहां गया ? पुलिस का यह कहना कि कंपनी द्वारा माल निकासी की सूचना देने के बाद भी विस्फोटकों से लदे वाहनों को सुरक्षा मुहैया कराने की जिम्मेदारी पुलिस की नहीं है, बहुत ही हास्यास्पद है। नियमानुसार तो विस्फोटकों से लदे वाहनों को पुलिस सुरक्षा मुहैया कराई ही जानी चाहिए। यदि पुलिस की जवाबदारी में इन वाहनों की सुरक्षा शुमार नहीं है, तो फिर किस हक से अब पुलिस द्वारा इसकी तहकीकात की जा रही है कि माल कितना निकला और कहां गया? इसके साथ ही, जब पुलिस के कारिंदे सडकों पर खडे होकर ट्रक चालकों से ‘चौथ’ वसूलते हैं, तब वे कागज देखकर उसमें लदे माल की तादाद, अनुज्ञा आदि के बारे में पूछताछ करके ही अपनी ‘चौथ’ के रेट तय करते हैं।
इतना ही नहीं , जब हर बार माल की लदाई के साथ ही इसकी सूचना जिला कलेक्टर और जिला पुलिस अधीक्षक को लिखित तौर पर भेज दी जाती है, तो फिर क्या वजह है कि अधिकारियों ने इन वाहनों का भौतिक सत्यापन करना जरूरी नहीं समझा। इन सब तथ्यों को देखने से समझ में आ जाता है कि इस मामले में कहीं न नहीं तो भारी गोलमाल है? इस विस्फोटक के पहले दुरुपयोग के बारे में यही कहा जा सकता है कि इसे देश में अस्थिरता पैदा करने वाली ताकतों के हाथों बेच दिया गया होगा या उनके द्वारा इसे लूट लिया गया होगा। दूसरी आशंका यह भी जताई जा रही है कि विस्फोटक को सडक, बांध आदि निर्माण में लगी कंपनियों के हाथों बेच दिया गया हो, जिसे वे अवैध खनन में इस्तेमाल कर सकती हैं। देशभर में सक्रिय खनन माफिया, जिनसे सफेदपोश, जनसेवक, खद्दरधारी और नौकरशाह प्रत्यक्ष या परोक्षतौर पर जुडे हुए हैं, के द्वारा इसका उपयोग किया जा सकता है। कुल मिलाकर 164 ट्रकों में 872 टन बारूद गायब हुए दो माह से अधिक समय बीत चुका है, पर हमारी सरकारों के माथे पर पसीना नहीं छलका है। यहीं यह भी साफ होता है कि सुरक्षा घेरे में रहने वाले नेताओं को जनता की फिक्र नहीं है।
- अंशू सिंह |
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