|
जाने -माने भौतिकशास्त्री स्टीफन हाकिंग एक बार फिर चर्चा में हैं। उन्होंने अपनी नई किताब ‘द ग्रांड डिजाइन’ में लिखा है कि दुनिया ईश्वर ने नहीं बनाई, बल्कि यह एक सामान्य वैज्ञानिक घटना है। यह पहली बार नहीं है, जब हाकिंग ने ईश्वर के अस्तित्व को नकारा है। उनकी 1988 में प्रकाशित किताब ‘अ ब्रीफ हिस्ट्री ऑफ टाइम’ में भी दुनिया के निर्माण में ईश्वर के योगदान को नकारा गया था। तब भी इस पर जमकर बहस हुई थी कि हाकिंग ने जो लिखा है, वह सही है अथवा गलत? ऐसा ही इस बार भी हो रहा है, पर इस बहस का कोई अर्थ है नहीं। जाहिर है कि ईश्वर की मौजूदगी को लेकर लाखों तर्क दिए जा सकते हैं, तो गैर-मौजूदगी को लेकर भी। न केवल बहस लंबी खिंच सकती है, बल्कि वह अनंतकाल तक चलती भी रह सकती है, फिर भी निष्कर्ष क्या निकलेगा? कोई निष्कर्ष निकल ही नहीं सकता।
इसलिए कि बहस चाहे जितनी लंबी चले , पर न तो ईश्वर को मानने वाले वैज्ञानिकों से सहमत हो सकते हैं और न ही वैज्ञानिक ईश्वर को मानने वालों से। जिसको लगता है कि ईश्वरवादियों के तर्क सुन-सुनकर स्टीफन हाकिंग जैसे वैज्ञानिक कहने लगेंगे कि हां, दुनिया ईश्वर ने ही बनाई है, वे गलत हैं। उधर, गलत वे लोग भी हैं, जो मानकर चलते हैं कि वैज्ञानिकों-अनीश्वरवादियों की बातें सुनकर ईश्वरवादी ईश्वर को मानने से इनकार कर देंगे। वस्तुतः दुनिया में ये दोनों धाराएं साथ-साथ चलती रही हैं और हमेशा साथ-साथ चलती भी रहेंगी। सच यह भी है कि कोई वैज्ञानिक भी ईश्वर को मानने वाला हो सकता है, तो कोई एक आम आदमी ऐसा भी हो सकता है, जो ईश्वर को मानता ही न हो। अतः दोनों धाराएं साथ चलें, तो बुराई भी क्या है?
फिर , दुनिया को बेहतर बनाने में न तो आस्तिकों का योगदान कम रहा, न ही नास्तिकों का। गैलीलियो नास्तिक थे, तो अरस्तू आस्तिक और आज अपने-अपने क्षेत्रों में दोनों के महत्व को कम करके नहीं आंका जा सकता। दोनों ने दीं भले ही अलग-अलग चीजें हों, पर झोली मानवता की ही भरी है। हम कल्पना करें कि आस्तिकों के डंडे के डर से यदि गैलीलियो आस्तिक हो गए होते, तो क्या विज्ञान ब्रह्मांड के रहस्यों को खोज पाया होता? इधर, यदि अरस्तू भी नास्तिक हो गए होते, तो क्या आत्मा और परमात्मा की खोज में बाधा न आ गई होती? यानी, गलत आस्तिक या नास्तिक होना नहीं है, बल्कि वह चेष्टा है, जो एक-दूसरे को अपने आपसे सहमत करने के लिए की जाती है। इससे बचना होगा। |