| | आखिर, सच तो जुबान पर आ ही जाएगा | | | |
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मशहूर बैडमिंटन खिलाडी और राष्ट्रमंडल खेलों की ब्रांड दूत साइना नेहवाल ने चाहे भले ही अब अपना बयान वापस ले लिया हो , पर सच वही है, जो उन्होंने शनिवार को कहा था। उन्होंने यही तो कहा था कि राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारियां आशा के अनुरूप नहीं हैं और हम वैसी तैयारियां नहीं कर पाए हैं, जैसी बीजिंग ओलिंपिक के लिए चीन और मेलबर्न राष्ट्रमंडल खेलों के लिए आस्ट्रेलिया ने की थीं। बताओ, इसमें गलत क्या है? देश का बच्चा-बच्चा समझ रहा है कि राष्ट्रमंडल खेलों की तैयारियों के दूध में कितना पानी है? जैसे, जब किसी दफ्तर का बाबू साहब के सामने फाइल रखता है, तो ऐसे पन्ने को सही पन्ने के साथ पकडकर पलट देता है, जो आधा-अधूरा होता है या जिसमें कोई गडबडझाला होता है। बिलकुल यही तरकीब राष्ट्रमंडल खेलों के मामले में दिल्ली की प्रदेश सरकार, भारत का खेल मंत्रालय व राष्ट्रमंडल खेल आयोजन समिति अपनाती लगती है।
अनेक स्टेडियमों का उद्घाटन हो चुका है। राष्ट्रमंडल खेलों के अंतरराष्ट्रीय सर्वेसर्वा माइक फेनेल आए और हमारे ‘बाबूगणों’ ने उन्हें भी झांसा दे दिया। उन्हें कोई स्टेडियम रात में चमचमाती विद्युत छटा के बीच घुमाया गया, तो कोई पिछले दरवाजे से ले जाकर। इसके बावजूद सच यही है कि निर्माण कार्य अभी पूरा नहीं हुआ है। इधर, खेलों की तैयारियों में भ्रष्टाचार के हो रहे नित-नए खुलासे भी राष्ट्रीय शर्मिंदगी का कारण बन रहे हैं। ऐसे में साइना ने जो कहा, वह बिलकुल सही है। पूरा देश चाहता तो यही है कि जब इन खेलों पर अरबों रुपए फूंक ही दिए गए हैं, तो खेलों का आयोजन भी ऐतिहासिक ही होना चाहिए। साइना भी यही चाहती हैं, पर तैयारियां देखकर कौन कह सकता है कि हमारी यह चाहत पूरी होगी ही? लिहाजा, सच भी जुबान पर आएगा ही। कभी साइना की पर, तो कभी किसी और की जुबान पर। |
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