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पीएम बोले, हद में रहे अदालत!
On 9/6/2010 9:34:20 PM

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नई दिल्ली । प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सडते अनाज पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती को भुला नहीं पाए, उन्होंने विनम्रता से ही पर सर्वोच्च अदालत को अपनी सीमा में रहने की नसीहत दे डाली। उन्होंने कहा अदालत नीति निर्धारण के क्षेत्र में हस्तक्षेप न करे। मनमोहन ने अपने निवास पर संपादकों से कहा कि करीब 37 प्रतिशत लोग हैं जो गरीबी रेखा के नीचे रह रहे हैं, उन्हें अनाज निशुल्क कैसे बांटा जा सकता है। यह संभव नहीं है।

पीएम का अबूझ तर्क

प्रधानमंत्री ने कहा कि गरीबों को मुफ्त अनाज देने से किसानों को अधिक खाद्यान्न उत्पादन करने के लिए प्रेरित करने के उपाय विफल हो जाएंगे। अगर अनाज उपलब्ध नहीं होगा, तो वितरित करने के लिए भी कुछ नहीं होगा।

अनाज नी टकराव का इरादा नहीं

मनमोहन इधर संपादकों के बीच कोर्ट को नसीहत दे रहे थे वहीं अदालत में उनके अतिरिक्त सोलिसिटर जनरल मोहन परासन हलफनामे के जरिए अदालत को बता रहे थे कि अनाज के मुद्दे पर केंद्र सरकार का अदालत के साथ टकराव का इरादा नहीं। उन्होंने कहा मीडिया के एक वर्ग में गलत खबरें प्रकाशित की जा रही हैं जिससे यह धारणा बन रही है कि सरकार इस मुद्दे पर न्यायपालिका के साथ टकराव के मूड में है। हालांकि अनाज गोदामों में सडने के बजाय इसे गरीबों में मुफ्त बांटने के न्यायालय के निर्देश के बारे में सरकारी हलफनामे में जिक्र नहीं किया गया है।

सबसे अच्छा तालमेल

प्रधानमंत्री ने कहा है कि उनकी सरकार में आपसी तालमेल पंडित नेहरू और इंदिरा गांधी के समय की सरकारों से भी ज्यादा है। उन्होंने बताया कि वह रिटायर होने की नहीं सोच रहे। प्रधानमंत्री ने इस बात को भी गलत बताया कि उनकी सरकार और कांग्रेस पार्टी में संवाद की कमी है।

फेरबदल के संकेत

पीएम ने कहा कि 7 नवम्बर से शुरू होने वाले संसद के शीतकालीन सत्र से पहले केंद्रीय मंत्रिमंडल में बदलाव के संकेत दिए। माना जा रहा है कि संसद के शीतकालीन सत्र से पहले कई मंत्रियों का पत्ता कट सकता है तथा कुछ नए चेहरे लाए जा सकते हैं।

देश की दिशा तय करेंगे फैसले

प्रधानमंत्री ने नक्सल समस्या, कश्मीर के हालात और बाबरी मस्जिद के आने वाले फैसले को कुछ शीर्ष मामले करार देते हुए कहा कि इनसे यह निर्धारित होगा कि आने वाले बरसों में भारत किस तरह से आकार लेगा। नक्सल समस्या पर प्रधानमंत्री ने कहा कि यह सबसे बडी सुरक्षा चुनौतियों में से एक है, जिसे तुरत फुरत हल नहीं किया जा सकता।

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