ग्वालियर। संविधान में भारतीय भाषा का दर्जा प्राप्त कर चुकी सिंधी भाषा आज भी अपनी पहचान के लिए मोहताज है। दिल्ली, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान के अलावा अन्य राज्यों में सिंधी भाषा को उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सम्मान नहीं मिल पाया है।
इन राज्यों को छोडकर अन्य राज्यों के विश्वविद्यालयों में यह भाषा अपनी पहचान तक नहीं बना पाई। यहां पर सिंधी भाषा में अध्यापन कार्य नहीं कराया जाता। जबकि देश के चार राज्य सिंधी भाषा को उच्च शिक्षा में शामिल कर चुके हैं। सिंधी भाषा को देश में स्थापित करने के लिए शिक्षाविद् व समाज सामने आ गए हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा विभाग के हिंदी भाषा प्रमुख डॉ. रविप्रकाश टेकचंदानी ने देश के विवि में हिंदी भाषा में अध्यापन शुरू करने की मांग की है। ग्वालियर प्रवास पर आए डॉ. टेकचंदानी पत्रकारों से विशेष चर्चा कर रहे थे। उन्होंने बताया कि राजस्थान लोक सेवा में सिंधी भाषा को विषय के रूप में शामिल कर लिया गया है, लेकिन अन्य राज्य इसे शामिल करने से इनकार कर रहे हैं। चूंकि मप्र में सिंधी समाज की संख्या काफी है, इसलिए यहां की लोक सेवा आयोग की परीक्षा में सिंधी भाषा को विषय का दर्जा दिया जाएगा। सिंधी समाज का अस्तित्व बचाने के लिए यहां पर सिंधी संस्कृति अकादमी का भी गठन होना चाहिए। इससे जहां प्रदेश में सिंधी समाज को पहचान मिलेगी, वहीं विशेष सम्मान के रूप में देखा जाएगा।
उन्होंने कहा कि आजादी के बाद जब सिंध प्रांत से सिंधियों का आगमन शुरू हुआ तो यहां के लोग उन्हें हीनभाव से देखते थे। इसी का नतीजा है कि सिंधी समाज को आज तक जाति विशेष का लाभ नहीं मिला। सिंधी समाज को भाषीय अल्पसंख्यक समाज का दर्जा दिया जाए। इसके अलावा सिंधी समाज को आरक्षण विशेष दूर रखा गया है, जबकि कई समाजों के लिए आरक्षण का कोटा निर्धारित किया गया है। डॉ. टेकचंदानी समाज की विशेष बैठक में शामिल होने आए हुए थे। इस दौरान कमल माखीजानी मौजूद थे। |