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काबिले-तारीफ है राहुल का परिश्रम
On 9/7/2010 10:24:35 PM

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राहुल गांधी इन दिनों जैसी राजनीति कर रहे हैं, उसके निहितार्थों को समझना कठिन नहीं है। सोमवार को उन्होंने कोलकाता की रैली में कहा कि यहां मुझे दो तरह के बंगाल दिख रहे हैं। एक माक्र्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का बंगाल है, जो चमक रहा है और दूसरा गरीबों का बंगाल है, जो मजबूर है। यानी, उन्होंने स्वयं को गरीबों का सिपाही घोषित कर दिया है। अब तक गरीबों का सिपाही होने का सबसे बडा दावा केवल कम्युनिस्ट ही किया करते थे। राहुल गांधी गरीबों के नए सिपाही हैं। इसका बंगाल विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को फायदा मिलता है या नहीं, यह तो भविष्य के गर्त में है, पर यह तो मानना ही पडेगा कि उन्होंने वामपंथियों से उनका मुद्दा छीन लिया है और अगर इसी मुद्दे पर कायदे से आगे बढा भी गया और वह भी ममता बनर्जी को साथ लेकर, तो बंगाल से वामदल उखड भी सकते हैं।

पश्चिम बंगाल की जनता वामपंथियों से नाराज भी है। इसमें तो कोई शक नहीं है कि सत्ता पाने और उसको चलाते रहने में वामदलों का कोई मुकाबला नहीं है, पर सच यह भी है कि सत्ता चलाने मात्र से जनता का कल्याण नहीं हो सकता। वामपंथी पार्टियों के गठबंधन ने वर्ष-1977 में पश्चिम बंगाल की सत्ता संभाली थी। तब से अब तक उनको वहां कोई चुनौती नहीं मिली। यदि ये लोग कायदे से काम करते, तो कोई शक नहीं कि पश्चिम बंगाल अब तक देश का एक आदर्श प्रदेश बन गया होता, पर ऐसा हो नहीं सका। चाहे शिक्षा हो और चाहे स्वास्थ्य, मानव विकास के सभी सूचकांकों में पश्चिम बंगाल जितना पीछे तीन दशक पहले था, उतना ही अब है।

यह सच है कि पश्चिम बंगाल में कभी सांप्रदायिक दंगे नहीं होते, पर सच यह भी है कि वामपंथी सरकार ऐसे निर्णय करने में कभी पीछे नहीं रहती, जिससे मुस्लिम कट्टरपंथी संतुष्ट होते हैं। यही लोग वामदलों के सबसे बडे वोट बैंक भी हैं, पर राहुल गांधी को इसका लाभ मिल सकता है कि गरीबों की न कोई जाति होती है और न ही कोई धर्म। गरीब केवल गरीब ही होते हैं। इधर, राहुल ने आदिवासियों के बीच भी अपनी पहुंच बनाई है। उडीसा की नियामगिरि पहाडियों में खनन पर केंद्र सरकार द्वारा लगाई गई रोक के केवल दो दिन बाद ही उन्होंने वहां आदिवासियों के बीच एक सभा की थी और खुद को दिल्ली में उनका सिपाही घोषित कर दिया था। उनकी इस राजनीति के अर्थ भी एकदम स्पष्ट हैं। कांग्रेस की समझ में यह बात आने लगी है कि यदि माओवादियों को सही रास्ते पर लाना है, तो उसको आदिवासियों के बीच जाना ही होगा। केंद्र सरकार आदिवासियों को लेकर एक राष्ट्रीय नीति को अंतिम रूप देने में तो पहले से ही जुटी हुई है। लगता है कि यह नीति आदिवासियों के बीच ले जाने का जिम्मा राहुल गांधी ने संभाल लिया है। राहुल की सभा हुई तो उडीसा के नियामगिरि में थी, पर वहां से उठी आवाजें पश्चिम बंगाल के आदिवासियों तक भी पहुंची होंगी। यह समुदाय भी वामपंथियों से नाराज है। यही तो कारण है कि अब आदिवासी वामपंथियों को नहीं, बल्कि माओवादियों को अपना हीरो और सच्चा कामरेड मानने लगे हैं।

बहरहाल, हमें राहुल गांधी के अभियान को केवल पश्चिम बंगाल तक सीमित मानकर नहीं चलना चाहिए। सच तो यह है कि राहुल गांधी उन सभी प्रदेशों में सक्रिय हैं, जहां कांग्रेस की सरकारें नहीं हैं। उन्होंने उत्तरप्रदेश में मायावती सरकार के खिलाफ दलित राजनीति की शुरुआत कर दी है, तो उडीसा में नवीन पटनायक सरकार के खिलाफ आदिवासियों में पकड बनाई है। जहां कर्नाटक सरकार के खिलाफ उनके पास रेड्डी भाइयों के अवैध उत्खनन का मुद्दा है, तो वहीं केरल सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार का। बिहार की नीतिश सरकार ने भी उनको कई ऐसे मुद्दे थमा दिए हैं, जिनको लेकर कांग्रेस उन पर हमले कर सकती है। बिहार विधानसभा चुनाव का भी ऐलान हो चुका है। कांग्रेस राहुल गांधी के द्वारा नीतिश कुमार की धर्मनिरपेक्षता पर सवाल उठवा सकती है।

रही बात मध्यप्रदेश और गुजरात की, तो फिलहाल तो इन दोनों प्रदेशों में राहुल गांधी सक्रिय नहीं लगते। राजनीतिक हल्कों में इसका एक अर्थ यह भी निकाला जा रहा है कि भाजपा और कांग्रेस नजदीक आ गए हैं, इसलिए भाजपा शासित इन दोनों प्रदेशों को राहुल के अभियान से बाहर रखा गया है, पर यह बात सच नहीं है। हमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए, यदि राहुल गांधी इन दोनों राज्य सरकारों के खिलाफ भी जल्दी ही सक्रिय हो जाएं, तो। कांग्रेस की एक राजनीति तो यह है कि दूसरे दलों की प्रदेश सरकारों के खिलाफ आंदोलन चलाने जैसी कार्रवाइयां करते रहो, तो दूसरी यह कि अभी हाल ही में जिन प्रदेशों में विधानसभा चुनाव होने हैं, वहां इतना प्रभाव उत्पन्न करो कि चाहे कांग्रेस सत्ता में भले ही न आ पाए, पर इतना तो हो ही कि वहां जिन पार्टियों की सत्ता आए, वे कांग्रेस के साथ चलने को पूरी तरह मजबूर हो जाएं।

राहुल के अभियान में तीसरी राजनीति आदिवासियों को कांग्रेस के पाले में लाने की है। देश में आदिवासियों की तादाद आठ से नौ फीसदी के बीच है। पश्चिम बंगाल, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ, उडीसा, बिहार, झारखंड, आंध*प्रदेश, पूर्वोत्तर के राज्यों और गुजरात में आदिवासियों की अच्छी-खासी आबादी है। ऊपर से देखने पर लगता है कि गुजराती जनजातियों को आदिवासियों के नाम पर हो रही राष्ट्रव्यापी राजनीति में कोई दिलचस्पी नहीं है। उनके नेता कांग्रेस और भाजपा के बीच राजनीतिक सौदेबाजी कर अपना हित साधने की फिराक में लगे रहते हैं, पर यह बात एक हद तक ही सच है। आदिवासियों के बीच हो रही राष्ट्रव्यापी हलचल से गुजरात के आदिवासी अछूते नहीं हैं। उनके बीच यदि माओवादियों की घुसपैठ नहीं हो पाई है, तो इसका कारण यह है कि नरेंद्र मोदी के शासनकाल में उनके बीच काम हुआ है। विभिन्न हिंदूवादी संगठन भी गुजरात की जनजातियों के बीच सक्रिय हैं और इस कारण ये माओवादियों के प्रभाव में आने से बची हुई हैं।

वहां तो राहुल का रास्ता भी आसान नहीं है। वैसे ईमानदारी की बात यह भी है कि राहुल गांधी का रास्ता पूरे देश में कहीं भी आसान नहीं है। राहुल गांधी नागरिकों को लुभाते हैं, ललचाते हैं, पर इसका अर्थ यह नहीं है कि ये लोग कांग्रेस के पाले में आ ही जाएंगे। पश्चिम बंगाल में वामपंथियों के खिलाफ जो क्षोभ है, उसका फायदा तो कांग्रेस को मिल सकता है, पर जल्दी ही नागरिक कांग्रेस से भी झुब्ध हो जाएंगे। क्या राजस्थान की कांग्रेस सरकार के खिलाफ नागरिकों में गुस्सा नहीं है या केंद्र सरकार को देश पसंद कर रहा है? सच यह है कि अपनी-अपनी सरकारों के खिलाफ सभी राज्यों की जनता में क्षोभ के बीज पाए जाते हैं, पर राहुल गांधी का अभियान आकर्षित इसलिए करता है, क्योंकि वे गैर-कांग्रेसी राज्य सरकारों की जनता का क्षोभ भुनाने की कोशिश तो कर रहे हैं। दूसरे दलों में तो ऐसा कोई नहीं है, जो कांग्रेस के खिलाफ पाए जाने वाले गुस्से को भुनाने की कोशिश कर रहा हो।

--डीबी कुंभज

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