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आखिर परंपराओं को तो निभाना ही होगा
On 9/7/2010 10:25:27 PM

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परंपराओं को कैसे जीवित रखा जाता है, इसका इल्म हम भारतीयों से बेहतर किसी को नहीं हो सकता। हमें मालूम है कि कौन-सी परंपरा को कैसे और किसलिए जीवित रखना है? हालांकि, बदलते वक्त के साथ हमने कुछ परंपराओं में बदलाव भी किए हैं, पर एक परंपरा ऐसी भी है, जिसे हम आज तक न बदल पाए हैं, न ही बदल सकने का माद्दा रखते हैं। यह बहुचर्चित परंपरा है, भ्रष्टाचार की। भ्रष्टाचार इस देश, इस समाज की सबसे पुरातन परंपराओं में से एक है। हम इस पुरातन परंपरा को बिना लाग-लपेट निभाए चले जा रहे हैं। दुनिया चाहे इधर से उधर क्यों न हो जाए, तकनीक चाहे कितनी ही विकसित क्यों न हो जाए, मगर भ्रष्टाचार की परंपरा जस की तस है।

हमारे देश में कुछ विभाग तो ऐसे हैं, जिन्हें भ्रष्टाचार का मयखाना तक कहा जाता है। इन मयखानों में जो गया, वो बिना तर हुए बाहर निकला ही नहीं। सबसे महत्वपूर्ण बात, आप अगर अपने देश से भ्रष्टाचार के कीटाणुओं को धोना चाहेंगे, तो एक दिन खुद ही धुल जाएंगे। यह वो दाग है, जो किसी भी अल्ट्रा डिटरजेंट से नहीं धुल सकता। बावजूद इस सच के, हमारी सरकार और मंत्री लोग इन दिनों कॉमनवेल्थ गेम्स के दागों को धोने में जुटे हुए हैं। अब ये दाग इस हद तक गहरे हो चुके हैं कि छूटने का नाम ही नहीं ले रहे। कॉमनवेल्थ गेम्स में गेम्स की जगह करप्शन कॉमन हो गया है। दिन कम बचे हैं, काम बहुत है, पर सब हो जाएगा की राह पर गाडी अपनी गति से लगातार चलती चली जा रही है।

दरअसल, कॉमनवेल्थ की हेल्थ अब तक बिलकुल ठीक-ठाक थी। समस्त भ्रष्ट काम मजे से चल रहे थे। किसी को खबर नहीं थी कि एसी और ट्रेड मिल का किराया कितना है, छतरी और कुर्सी के दाम क्या हैं, मगर बुरा हो इस मीडिया का जिसने सब गुड गोबर कर डाला। उस रोज बरसात में छत क्या टपकी, सब कुछ टपकने-बहने लगा। परतें परत-दर-परत उधडने लगीं। मंत्री सकते में आ गए, सरकार बेचैन हो उठी और विपक्ष सिर पर सवार।

हमारे यहां खेल और शादी के कामों को एक समान ही माना जाता है। जैसे शादी के काम में अगर कुछ खामियां-खराबियां रह जाती हैं, तो उन्हें एक-दूसरे पर डालकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त हो लिया जाता है। ठीक वैसा ही हाल कॉमनवेल्थ गेम्स का है। अब इतने बडे आयोजन में अगर कुछ कमियां रह भी जाती हैं, तो इसमें इतना शर्मसार होने की जरूरत क्या है? हमें समझना चाहिए कि कॉमनवेल्थ गेम्स के बहाने हम भ्रष्टाचार की पुरातन परंपरा को ही निभा रहे हैं। यह बहुत बडी बात है। ऐसे बडे कामों में थोडा बहुत भ्रष्टाचार तो चलता है, भाई। यह भ्रष्टाचार की ही ताकत है कि आज देश के हर बंदे को मालूम है कि हमारे यहां कॉमनवेल्थ गेम्स होने जा रहे हैं, वरना कल तक तो यहां सुनसान ही थी।

मीडिया ने बहुत उछाल ली कॉमनवेल्थ गेम्स की टोपी। अब उसे बस करना चाहिए। रही बात बाकी बचे कामों की, तो वे भी पूरे हो ही जाएंगे। कामों को कैसे निपटाया जाता है, इसको हमारे हुक्मरानों से बेहतर कोई और नहीं जान सकता।

--अंशुमाली रस्तोगी

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