| | आओ, हिंदी भाषा की साधना करें | | | |
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केंद्रीय सूचना -प्रसारण मंत्री अंबिका सोनी, जो कि अंग्रेजी, हिंदी, स्पेनिश, फ्रेंच और इतालवी में पारंगत बताई जाती हैं, अभी हाल ही में पीआईबी द्वारा तैयार किया गया 7266 करोड रुपए का बुंदेलखंड पैकेज पढ रही थीं। वे ‘संरचना’ शब्द पर अटक गईं। उन्होंने समीप बैठे अधिकारी को डांटते हुए कहा कि यह क्या है, आप लोग सरल शब्द क्यों नहीं लिख सकते? सरल और कठिन के बीच फंसी बेचारी हिंदी का राष्ट्रभाषा-स्वरूप क्या सरकारें निश्चित करेंगी? क्या हिंदी भवनों की स्थापना और सितंबर मास में हिंदी पखवाडे मनाने की औपचारिकता हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाएगी?
विज्ञान और प्रौद्योगिकी सहित सभी विधाओं और भावों को व्यक्त करने में समर्थ हिंदी एक अत्यंत समृद्ध भाषा है , लेकिन क्या हिंदी में ऐसे साहित्य का सृजन हो रहा है? हमारी हिंदी का सबसे बडा दुर्भाग्य यह है कि उसकी हैसियत उत्तर भारत के हिंदी-प्रदेशों की हैसियत से आंकी जाती है। देश का यह भू-भाग मानव-विकास के प्रतिमानों पर इतना पिछडा हुआ है कि यहां के अनेक प्रदेशों को बीमारू प्रदेश की संज्ञा दी गई है। इसी पूर्वाग्रह के आधार पर अंग्रेजी के भक्त समृद्ध हिंदी को भी पिछडी भाषा मान लेते हैं।
भाषा के प्रति अपना दृष्टिकोण समझने के लिए हम एक मॉडल का अध्ययन करें। भाव या विधा के अनुसार भाषा सरल या गंभीर होती है। हम हिंदी भाषियों तथा विशेषकर हमारे अर्द्ध -शिक्षित नीति-निर्धारकों की सबसे बडी खामी यही है कि जो शब्द हमारे पल्ले नहीं पडता, उसे हम क्लिष्ट कहकर खारिज कर देते हैं। अंग्रेजी-भाषी शब्दकोष देखता है। जिन्हें हम क्लिष्ट शब्द कहते हैं, वे अपरिचित व्यक्तियों की भांति हैं। यदि हम उनसे परिचय नहीं करेंगे, तो हमारा परिचय-संसार सिकुडकर रह जाएगा। अंग्रेजी में शब्द-स्रोत लेटिन और ग्रीक हैं। उर्दू के शब्द-स्रोत अरबी और फारसी में हैं, लेकिन हिंदी जब अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए भारत की सभी भाषाओं की जननी संस्कृत की ओर जाती है, तो लोग नाक-भौं सिकोडते हैं। वे संस्कृत से डरते हैं, जबकि बिना संस्कृत की ओर गए वह शब्द-सर्जना नहीं हो सकती, जो इक्कीसवीं सदी के विश्वीकृत ज्ञान की संवाहिनी भाषा की मूल आवश्यकता है।
हिंदी -प्रदेशों का मध्यम और उच्च वर्ग नकलची है, जो यूरोप-अमेरिका की नकल करता है। ऐसा वर्ग भला मौलिक सृजन कैसे करेगा? क्या हमारे जिस वर्ग में क्रयशक्ति है, वह हिंदी की पुस्तकें या पत्र-पत्रिकाएं खरीदता है? हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है। फिर तो हिंदी का पाठक वर्ग और हिंदी में प्रकाशित साहित्य की प्रसार संख्या बढना चाहिए, लेकिन क्या हिंदी की किसी पुस्तक या पत्र-पत्रिका की प्रसार संख्या तमिल, तेलुगू, कन्नड, मराठी, बंगाली या गुजराती के बराबर है? शायद ही किसी हिंदी-पुस्तक का प्रथम संस्करण दो हजार प्रतियों से अधिक छपता हो। इनका दूसरा संस्करण तो विरले ही छप पाता है।
एक स्वघोषित बहुत बडा हिंदी का दैनिक , जिसके एक दर्जन से अधिक प्रदेशों से बीसियों संस्करण निकलते हैं, अब वह अंग्रेजी पुस्तकों के ही ‘रिव्यू’ करता है। क्या हिंदी में स्तरीय साहित्य का प्रकाशन बंद हो गया है? हिंदी कभी बांझ नहीं हो सकती। हम हिंदी-भाषी जरूर भाषाई नपुंसक हैं। हममें भाषाई साधना से प्राप्त सिद्धि तो छोडिए, भाषाई अस्मिता भी नहीं है। हम लफ्फाजी जरूर करते हैं। वह भी सितंबर के महीने में खासतौर पर।
अन्य भाषा -भाषियों के संदर्भ में हिंदी-भाषियों के लिए एक और बिंदु विचारणीय है। भारत के लगभग सभी प्रदेशों के लोग हिंदी का व्यावहारिक ज्ञान रखते हैं। क्या हम हिंदी-भाषी देश की किसी भी एक भाषा का व्यावहारिक ज्ञान रखते हैं? अहिंदी भाषी लोग इसी प्रसंग में हिंदी-साम्राज्यवाद का जिक्र करते हैं। हम मीडिया पर हिंदी को विकृत करने का आरोप लगाते हैं, लेकिन यह क्यों नहीं मानते कि जो बिकता है, वही बनता है। हिंदी-भाषियों को हिंदी की साधना नवधा-भक्ति के रूप में करनी होगी। हम हिंदी में सोचें, हिंदी में बोलें। हिंदी लिखें, हिंदी पढें, हिंदी पढाएं। हिंदी बेचें, हिंदी खरीदें, विदेशों में हिंदी ले जाएं, स्वदेश में अंग्रेजी के साथ हिंदी को प्राथमिकता दें, तो हिंदी के प्रसार को कौन रोक सकता है? हिंदी के नाम पर होने वाले कर्मकांडों का कोई मतलब नहीं है।
--घनश्याम सक्सेना |
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