| | प्रधानमंत्री का नया और ‘अनोखा’ अर्थशास्त्र | | | |
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इसमें कोई संदेह नहीं कि प्रधानमंत्री डॉ . मनमोहन सिंह दुनिया के चोटी के अर्थशास्त्रियों में से एक हैं, लेकिन सोमवार को सड रहे अनाज को गरीबों में मुफ्त बांटने के सुप्रीम कोर्ट के निर्देश को लेकर उन्होंने देश को अर्थशास्त्र का जो ‘ज्ञान’ दिया है, वह किसी की समझ में नहीं आया। उन्होंने कहा कि गरीबों को मुफ्त अनाज देने से वे उपाय विफल हो जाएंगे, जो किसानों को खाद्यान्नों का उत्पादन बढाने की प्रेरणा देने के लिए किए गए हैं। बहरहाल, यह तर्क ही गलत है और अर्थशास्त्र के सामान्य सिद्धांतों को शीर्षासन कराने वाला भी। भला अन्न यदि गरीबों में मुफ्त बांटा जाता है, तो इससे किसान निराश कैसे हो सकते हैं और कैसे वे खाद्यान्नों का उत्पादन बढाने से पीछे हट सकते हैं? यह तब होता, जब अन्न किसानों के घरों में रखा होता। यदि सरकार तब गरीबों को मुफ्त अनाज वितरित कर देती, तो किसानों को लगता कि अब उनका घर में रखा हुआ अनाज बिकेगा नहीं और इसके बाद वे अनाज का उत्पादन बढाने से पीछे भी हट सकते थे, मगर वह समय तो डेढ-दो दशक पहले ही बीत गया, जब किसानों के अन्न के भंडार भरे हुए होते थे, उनमें उपज रोकने की क्षमता होती थी।
अब तो स्थिति यह है कि कृषि की बढती हुई लागत और कर्ज का बोझ उपज को किसानों के पास रुकने ही नहीं देता। एक मोटा आकलन यह है कि इन दोनों मदों में ही किसानों की करीब अस्सी फीसदी उपज चली जाती है। बाकी उसके पास जो करीब बीस फीसदी उपज बचती है , वह गुजर-बसर के लिए होती है, बेचने के लिए नहीं। अतः गरीबों को मुफ्त अनाज बांटो या न बांटो, इससे किसानों की सेहत पर कोई फर्क नहीं पडता। उनका मतलब तो सिर्फ यहां तक होता है कि उनकी उपज वाजिब समर्थन मूल्य पर बिक जाए। इसके बाद चाहे तो वह गोदामों में सड जाए या शराब और इथेनॉल बनाने वाले कारखानों में चली जाए या फिर गरीबों में बांट दी जाए, इससे किसानों का क्या लेना -देना? ऐसा भी संभव नहीं कि प्रधानमंत्री इन सब बातों को जानते नहीं होंगे। वे सब जानते हैं, पर चूंकि उन्हें गरीबों के नहीं, बल्कि बाजार के हित पूरे करना हैं, इसलिए वे किसानों की ओट लेकर सुप्रीम कोर्ट का गरीबों को मुफ्त अनाज बांटने का निर्देश मानने से इनकार कर रहे हैं। किसानों की भलाई के नाम पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय भी नहीं मानना पडेगा और कोई उंगली भी नहीं उठेगी, यह प्रधानमंत्री का नया ‘अर्थशास्त्र’ है। देश को इस अर्थशास्त्र के झांसे में आने से बचना चाहिए। |
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