| | इसको हडताल नहीं, पाखंड कहना होगा | | | |
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यदि इस बात पर गौर करें कि आठ ट्रेड यूनियनों ने मंगलवार को देशव्यापी हडताल किन -किन मुद्दों पर की, तो समझ में आएगा कि वह हडताल गलत नहीं थी। मसलन-महंगाई, निजी व सार्वजनिक उपक्रमों में हो रहा श्रम-कानूनों का उल्लंघन और सार्वजनिक क्षेत्रों के उपक्रमों का धीरे-धीरे हो रहा निजीकरण आदि कुछ ऐसे मुद्दे हैं, जिनके विरोध में होने वाले किसी भी आंदोलन का समर्थन ही किया जाना चाहिए, पर क्या ट्रेड यूनियनें यह मानकर चलती हैं कि वे साल-दो साल में एक बार जागेंगी, फिर हडताल या बंद आयोजित करके अपनी उपस्थिति का अहसास कराएंगी, तो सरकार डर के मारे पूंजीवाद का रास्ता छोड फिर से समाजवाद के रास्ते पर चलने लग जाएगी?
सरकार को सही रास्ते पर लाने के लिए सतत आंदोलन की जरूरत है और आंदोलन भी ऐसा होना चाहिए कि उससे देश या जनता का कामकाज प्रभावित न हो। चूंकि ट्रेड यूनियनों की हडताल से बैंकिंग , यातायात और संचार आदि क्षेत्रों का कामकाज बुरी तरह प्रभावित हुआ। फिर, इन यूनियनों के पास ऐसी कोई रणनीति भी नहीं है, जिसके कारण पूंजीवाद की सडक पर सरपट भागती सरकार की रफ्तार को ब्रेक लगे। अतः ऐसे किसी आंदोलन का समर्थन भी नहीं किया जा सकता, जिसका उद्देश्य सरकार को गलत निर्णय लेने से रोकने से ज्यादा यह हो कि कुछ संगठन अपनी उपस्थिति दर्ज करा दें। इससे तो देश की जनता और सरकार की नजरों में आंदोलनों की अहमियत ही कम होती है। पाखंड देखकर जहां जनता किसी गंभीर आंदोलन में शिरकत नहीं करती, तो वहीं आंदोलनों के नाम पर होने वाले पाखंड सरकार पर कोई दबाव भी नहीं बना पाते। तय है कि ट्रेड यूनियनों की यह हडताल भी सरकार पर कोई दबाव नहीं बना पाएगी। अतः ऐसी हडतालों का कोई औचित्य भी नहीं है। |
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