नई दिल्ली । उच्चतम न्यायालय ने लखनऊ स्थित पुराने जेल परिसर में उसके आदेशों का उल्लंघन करके कथित तौर पर अवैध निर्माण करने के लिए मायावती सरकार से मंगलवार को स्पष्टीकरण मांगा।
न्यायमूर्ति पी सदाशिवम और न्यायमूर्ति ए आर दवे की पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार की उस दलील को खारिज कर दिया कि वह सिर्फ चहारदीवारी और जन सुविधाओं का निर्माण कर रही है। पीठ की अध्यक्षता कर रहे न्यायमूर्ति सदाशिवम ने कहा कि तस्वीरें अनेक ढांचों को दर्शाती हैं। यह बांध स्थल जैसा लगता है। अगर वे सिर्फ चहारदीवारी के लिए हैं तो आप क्यों इतना सीमेंट और स्टील बर्बाद कर रहे हैं। पीठ ने यह साफ कर दिया कि वह वरिष्ठ अधिवक्ता कृष्ण वेणुगोपाल की दलीलों को समझ नहीं पा रही है कि निर्माण सिर्फ जन सुविधाओं से संबंधित हैं। वेणुगोपाल राज्य सरकार की ओर से उपस्थित हुए थे।
पीठ ने कहा कि हम इस बात को स्वीकार करने में सक्षम नहीं हैं कि यह चहारदीवारी है। आपको मौजूदा स्थिति को स्पष्ट करना होगा। जिस तरह से सामग्रियां गिराई गई हैं, वह दर्शाती हैं कि बडे ढांचे का निर्माण किया जा रहा है। आप हमारे आदेशों की उपेक्षा नहीं कर सकते।
शीर्ष अदालत ने यह टिप्पणी करते हुए राज्य सरकार से दो हफ्ते के भीतर हलफनामा दायर करके उन आरोपों का स्पष्टीकरण देने को कहा कि पुराने जेल परिसर की 195 एकड जमीन पर अवैध निर्माण किया जा रहा है। न्यायालय ने यह आदेश संगम लाल पांडे की ओर से दायर आवेदन पर पारित किया। इस आवेदन में उन्होंने मायावती सरकार पर उच्चतम न्यायालय के पूर्व के निर्देशों का उल्लंघन करने का आरोप लगाया। न्यायालय के पूर्व के आदेश में कहा गया था कि उस स्थान पर किसी स्मारक या ढांचे का निर्माण नहीं किया जाना चाहिए। पांडे के अनुसार शीर्ष अदालत ने आठ सितंबर 2009 और छह नवंबर 2009 को अलग-अलग आदेशों के जरिए राज्य सरकार को उस स्थान पर किसी भी स्मारक का निर्माण करने से रोका था।
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