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On 9/8/2010 9:19:44 PM

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भारत सरकार ने चीन के पिछले बीस साल के इतिहास को देखने के बाद यह तय किया है कि चीन पंचशील के रास्ते पर तो नहीं ही चल रहा, बल्कि भारत के अरुणाचल और लद्दाख के इलाकों पर अपनी दावेदारी जताने और कब्जा करने की पूरी कोशिश कर रहा है। इतने दिनों तक मनमोहन सिंह की सरकार खामोश थी, लेकिन कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटीज की लंबी बैठक के बाद अब यह तय किया गया है कि चीन से हर मोर्चे पर निपटना होगा और अगर चीन अरुणाचल प्रदेश की बात करता है, तो भारत को भी तिब्बत की बात करना होगी। भारत सरकार अब चीन के एक-एक कदम पर टिप्पणी कर रही है। भारत ने सबसे पहले तो चीन और पाकिस्तान के बीच परमाणु सहयोग को मुद्दा बनाने का फैसला किया है और इसे सार्वजनिक करने का भी फैसला किया है।

1962 और 2010 में बहुत फर्क

चीन अपनी ताकत दिखाने के लिए दुनिया को पीपुल्स लिबरेशन आर्मी के फोटो और वीडियो ही दिखाता है, जिनमें बौने सैनिक कलाबाजियां करते दिखाई पडते हैं, जबकि कई मामलों में चीन के अंदरुनी हालात भी ठीक नहीं हैं। चीन को यह अहसास कराया जाए कि 1962 और 2010 में बहुत फर्क है। भौगोलिक तौर पर जिन-जिन देशों के जरिये चीन भारत को घेरने की कोशिश कर रहा है, उनमें से केवल एक म्यांमार को छोड दें, तो सबके सब अमेरिका के आर्थिक गुलाम हैं। हमें अमेरिका को थोडी-सी सुविधाएं और उसके कार्यक्रमों के लिए आधार देना है, तो चीन के ये पिछलग्गू तो अपने आप सीधे हो जाएंगे। अमेरिका पता नहीं कब से कोशिश कर रहा है कि भारत उसका दोस्त बन जाए। अमेरिका से निकटता बढाई जाए और दक्षिण कोरिया, ताईवान और कंबोडिया को अपने हाथ में ले लिया जाए, तो सब ठीक हो जाएगा। भारत यही कर भी रहा है।

चीन-जापान

चीन-जापान युद्ध 1894-95 के दौरान चीन और जापान के मध्य कोरिया पर प्रशासनिक तथा सैन्य नियंत्रण को लेकर लडा गया था। जापान की मेइजी सेना इसमें विजयी हुई थी और युद्ध के परिणाम स्वरूप कोरिया, मंचूरिया तथा ताईवान का नियंत्रण जापान के हाथ में चला गया। इस युद्ध में हारने के कारण चीन को जापान के आधुनिकीकरण का लाभ समझ में आया। इसे प्रथम चीन-जापान युद्ध का नाम भी दिया जाता है। 1937-45 के मध्य लडे गए युद्ध को द्वितीय चीन-जापान युद्ध कहा जाता है। चीन जापान के पूर्वी सागर के सवाल पर नई टक्कर व विवाद निर्मित करने का विरोध करता है। भारत के जापान से मधुर संबंध रहे हैं। यदि भारत प्रयास करें तो जापान भी चीन को घेरने में साथ दे सकता है।

चीन-ताईवान के बीच रिश्ते

चीन और ताईवान इतिहास में पहली बार 100 सालों में 2010 में बातचीत के लिए तैयार हुए, फिर भी हालात मुफीद नहीं हैं। गाहे-बगाहे चीन अपनी बात ताईवान पर थोंपने की कोशिश करता है। 1958 में इस महाद्वीप पर चीन की सेना ने बमबारी कर कई हिस्सों को बडे स्तर पर नुकसान पहचाया था। यहां से चीन और अमेरिका में युद्ध के आसार बने। ताईवान ने चीन के कारण यूएन सीट हारी। ताईवान ने अपनी भूमि को पाने के लिए 1991 में सेना को एकत्रित किया। 1971 में ताइवान ने यूएन सीट हारी।

चीन-दक्षिण कोरिया

पूरे शीत युद्ध के दौरान चीन और दक्षिण कोरिया के बीच कोई संबंध नहीं रहे। लेकिन दक्षिण कोरिया के चीन गणराज्य (ताईवान) के साथ रहे। दक्षिण कोरिया अपने नागरिकों और व्यवसायियों के हित चीन से अंतरराष्ट्रीय समझौते के तहत कुछ रूपों में साधने में असमर्थ रहा। चीन में 5 लाख से दक्षिण कोरिया के नागरिक रहते है, लेकिन वे वहां सुरक्षित नहीं हैं। चीन के साथ दक्षिण कोरिया के संबंध तनाव एवं अविश्वासपूर्ण रहे। चीन के नजदीकी संबंध उत्तर कोरिया से रहे। दक्षिण कोरिया और उत्तर कोरिया के बीच मधुर संबंध स्थापित नहीं होने के पीछे भी चीन की खुरापात ही है। दक्षिण कोरिया कई बार अंतरराष्ट्रीय मंचों पर चीन की साम्राज्यवादी नीतियों का विरोध करता आया है। भारत ने दक्षिण कोरिया से संफ कर चीन को घेरने की रणनीति पर काम कर रहा है। यदि रणनीति कामयाब रही तो ड्रैगन को कई दिक्कतों का सामना करना पड सकता है।

अगर तुम हमें घेरोगे, तो घेरना हमें भी आता है

रक्षामंत्री एके एंटनी चीन के पडोसी और उससे लगभग हर मुद्दे पर भिडने वाले दक्षिण कोरिया के दौरे पर गए थे। इस दौरे में उनके साथ सेना का एक तगडा प्रतिनिधि मंडल भी शामिल था। यह भारत का चीन को सीधा संदेश है कि अगर तुम हमें घेरोगे, तो घेरना हमें भी आता है। सब जानते हैं कि चीन श्रीलंका, म्यांमार, मालदीव, पाकिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश के अपने सैन्य अड्डों के जरिये भारत पर सामरिक दबाव बनाना चाहता है। दक्षिण कोरिया और कंबोडिया को अगर भारत ने समर्थन और सहयोग देना शुरू कर दिया, तो चीन अपने पडोस में ही उलझकर रह जाएगा।

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