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अब होठों की लाली बढाएगी मिर्च
On 9/9/2010 12:15:03 PM

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वाराणसी । भारतीय सब्जी अनुसंधान संस्थान (आईआईवीआर) ने मिर्च की एक ऐसी प्रजाति विकसित की है, जिसमें तीखापन एकदम नहीं है। इस मिर्च से तैयार प्राकृतिक रंग का इस्तेमाल लिपिस्टिक सहित अन्य कॉस्मेटिक सामानों दवाओं एवं खाद्य पदार्थों में किया जा सकता है।

डीरेका-चुनार रोड पर अदलपुरा स्थित आईआईवीआर के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. राजेश कुमार एवं उनके सहयोगियों द्वारा विकसित मिर्च की इस नई प्रजाति का नाम आईवीपीबीसी 535 है। इसे पाइर्पिका भी कहते है। उन्होंने बताया कि इस मिर्च का इस्तेमाल खाने के लिए नहीं, बल्कि प्राकृतिक रंग तैयार करने में किया जाता है। इस मिर्च से ओलियोरेजिन तेल निकलता है। इससे तैयार प्राकृतिक रंग का प्रयोग लिपस्टिक सहित  अन्य सामानों, खाद्य पदार्थों एवं दवाओं में किया जा सकता है। इस रंग से तैयार पदार्थ त्वचा को नुकसान भी नहीं पहुंचाते। विश्व बाजार में इस मिर्च से बने प्राकृतिक रंग की काफी मांग है।

कुमार ने बताया कि इस मिर्च की पैदावार कई रंगों में होती है। लाल, पीली, नारंगी, भूरी और बैगनी रंग वाली पाइप्रिका पूर्वांचल के परिवेश में आसानी से उगाई जा सकती है। इसकी पैदावार प्रति हेक्टेयर 60 से 80 क्विंटल तक की जा सकती है और इससे प्रति एकड डेढ लाख रुपए तक कमाई की जा सकती है। उन्होंने बताया कि प्राकृतिक रंग बनाने वाली मिर्च हंगरी में खोजी गई थी। यूरोप में यह मिर्च काफी लोकप्रिय है। लेकिन अब तक पाइप्रिका की कोई ऐसी प्रजाति नहीं थी, जिसका भारतीय जलवायु में उत्पादन किया जा सके।

2002 में शुरू हुआ शोध

कुमार व उनके सहयोगियों ने गर्म प्रदेश की पाइप्रिका मिर्च पर 2002 में अनुसंधान शुरू किया। गर्म जलवायु इलाकों में पाइप्रिका मिर्च तीखी हो जाती है,लेकिन इसे तीखा नहीं होने दिया। उनके अनुसंधान पर चार वर्षों तक देश के कृषि विश्वविद्यालय में इसका परीक्षण हुआ। तब जाकर इसमें सफलता मिली।उन्होंने बताया कि आईवीपीबीसी 535प्रजाति की मिर्च का प्रस्ताव बनाकर आईआईवीआर केंद्र सरकार को भेजेगा, जहां से इसे रिलीज किया जाएगा।

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