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माओवादियों से उन्हीं की भाषा बोले
On 9/9/2010 9:28:27 PM

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स्वामी अग्निवेश चुके हुए या बीते हुए फिल्मी सितारों की तरह हैं, जिन्हें रिटायरमेंट की सोचते- सोचते अचानक एक हिट फिल्म नसीब हो जाती है या फिर जैसा अमिताभ बच्चन के साथ हुआ था कि एक कार्यक्रम कौन बनेगा करोडपतिउनका भाग्योदय कर देता है, किस्मत और नियति की दिशा बदल देता है। यही स्वामी अग्निवेश के साथ हुआ है। अपने सामाजिक सरोकारों यानी बंधक बच्चों को छुडाने के अभियान में उनका आंदोलन नुक्कड सभा में बदलता जा रहा था और अग्निवेश अपने आर्य समाज के अतीत को वर्तमान बनाकर उसी में भविष्य भी तलाश रहे थे।

अचानक उनकी जिंदगी में माओवाद का मंत्र आया और वह इसलिए कि जन्म से स्वामीजी तेलुगू और उस पर भी राव हैं और माओवादी आंदोलन में राव जाति की खूब चलती है। इस बात को तो भुला ही दीजिए कि माओवाद धर्म, जाति और कर्मकांड से परे है। सबसे मशहूर माओवादी कमांडरों में से एक किशनजी का नाम भी कोटेश्वर राव है। अग्निवेश के संफ कुछ माओवादिओं से हुए और वे खुद मंजूर करते हैं कि इन संबंधों को पनपाने में उन्होंने हेमचंद्र पांडे नाम के पत्रकार का इस्तेमाल किया। यही पत्रकार आजाद नाम के ताकतवर माओवादी कमांडर के साथ फर्जी या असली, आप चाहे जो कहें, मुठभेड में मारा गया। अग्निवेश ने फौरन इसका श्रेय बटोरने का अभियान शुरू कर दिया।

अग्निवेश ने कहा कि माओवादी बातचीत शुरू करना चाहते थे और इसीलिए आजाद उनका संदेश लेकर आंध्रप्रदेश से छत्तीसगढ जा रहा था और रास्ते में नागपुर से उठाकर उसका और हेमंचद्र पांडे का एनकाउंटर कर दिया गया। इस दावे ने अग्निवेश को इतनी प्रासंगिकता तो दी कि जो चिदंबरम उन्हें महीनों में मिलने का समय देते थे, वे फोन पर आने लगे और पत्रों का जवाब भी देने लगे। अग्निवेश को ममता बनर्जी ने भी लालगढ की अपनी तूफानी रैली में क्रांतिकारी बताकर पेश किया। अग्निवेश ने भी कहा कि आजाद की फर्जी मुठभेड की जांच होनी चाहिए और वे आजाद को श्रंद्धाजलि देते हैं।

आज भी अग्निवेश की राय में आजाद देशभक्ति का एक बडा प्रतीक है। वे भारत सरकार के वार्ताकार और माओवाद के मामले में प्रवक्ता बनना चाहते हैं और इसीलिए बयानबाजियां और इंटरनेट पर पूरी दुनिया का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं। भारत में माओवादियों के मुद्दे और पूरे माओवाद को ही लेकर बहस भटक गई है। एक तरफ हवाई जहाजों में घूमकर एयरकंडीशंड सेमिनारों में प्रवचन करने वाले अरुंधती राय जैसे महान बुद्धिजीवी हैं, जो तीन दिन माओवादी हत्यारों के संरक्षण में उनके आखेट स्थल का दौरा करके आईं और जब से लौटी हैं, तभी से उसे भुना रही हैं। छत्तीसगढ और बिहार में हाल ही में जिन निर्दोष लोगों की हत्या माओवादी कातिलों ने की है, उनके लिए अरुंधती राय और स्वामी अग्निवेश के पास करुणा व सहानुभूति का एक शब्द भी नहीं है।

महाश्वेता देवी दुनिया को बदलने के लिए लिखती रही हैं और माओवादियों के तरीकों से नहीं, तो सरोकारों से जरूर उनका गहरा वास्ता रहा है, लेकिन जब माओवादी बस उडाते हैं या सुरक्षा बलों के जवानों को मारते हैं या पुलिस वालों का अपहरण करके और कत्ल करके लाश फेंक देते हैं, तो महाश्वेता देवी का दिल दुखता है। साहित्य और समाज में महाश्वेता देवी की जो हैसियत है, उसको इस जन्म में अरुंधती राय कभी नहीं पा सकतीं और स्वामी अग्निवेश तो खैर इतने घाटों का पानी इतने बर्तनों में पी चुके हैं कि उन पर उनके साथी भी कोई खास भरोसा नहीं करते। दिक्कत भारत सरकार की भी कम नहीं है। गृह मंत्री पी. चिदंबरम कहते हैं कि माओवादियों से तब तक कोई बात नहीं हो सकती, जब तक कि वे हथियार डालकर आत्म-समर्पण नहीं कर देते। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह कहते हैं कि माओवादी हमारे भाई हैं और हम उनसे बातचीत करने के लिए सहर्ष तैयार भी हैं।

यह सही है कि अगर विकास हुआ होता और आदिवासी अंचलों में और जंगलों में लोग, खासतौर पर आदिवासी सुख से सुरक्षित रह रहे होते, तो माओवादियों को पांव टिकाने की जमीन भी नहीं मिलती, लेकिन इसका अर्थ यह भी कतई नहीं है कि हमें माओवादी बताएंगे कि देश के विकास का मॉडल कैसा होना चाहिए और अधिकारी अपनी सरकारों की बजाय दलमकी पंचायत द्वारा दिया गया हुक्म मानेंगे। विकास की गति बहुत धीमी है, तो इसके लिए हमारी निर्वाचित सरकारें अपराधी हैं, लेकिन उन्हें हमने ही चुना है। रमन सिंह और शिवराज सिंह से अगर कोई जवाब मांगना होगा, तो हम-आप मांगेंगे। जवाब उन्हें देना ही पडेगा, लेकिन माओवादी अगर अपने आपको न्यायमूर्ति और भारत के लोकतंत्र को अपराधी और हवालाती साबित करने की कोशिश करेंगे, तो जाहिर है कि उनका एक ही इलाज है और वह है, गोली।

जब गोलियां बरसेंगी, तो अरुंधती राय इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में और स्वामी अग्निवेश जंतर-मंतर पर बंधुआ मुक्ति मोर्चा के उजडे हुए दफ्तर में बैठे नजर आएंगे। फायरिंग में माओवादी मारे जाएंगे, सुरक्षा बल तबाह होंगे और आम आदमी उजड जाएंगे। जिन लोगों को माओवाद में दुनिया के परिवर्तन की दिशा नजर आती हो, वे जरा चीन की ओर नजर घुमाकर देख लें। चीन से माओवाद कब का गायब हो चुका है और थ्येन आनमन चौराहे पर माओ की एक प्रतिमा जरूर है, लेकिन यह चौराहा वहां हुए उस नरसंहार की वजह से ज्यादा याद किया जाता है, जिसमें हजारों लोग मारे गए थे।

भारत में माओवाद से निस्तार पाना तत्काल और आपात हिसाब से बहुत जरूरी है। यह कोई अच्छी स्थिति नहीं है कि देश के लगभग आधे सुरक्षा बल कुछ हजार माओवादियों व उनके कुछ लाख बंधक चेलों से निपटने में लगे हुए हैं। सरकार के लिए तो फिर भी कानून है, मगर माओवादियों का कानून और संविधान तो सिर्फ बंदूक है, जिससे वे विकास की भाषा नहीं लिख रहे, बल्कि विनाश का भविष्य ही लिख रहे हैं। विनाश तो माओवादियों का भी होगा, लेकिन देश के इतिहास में ये कुछ वर्ष काले अक्षरों से जरूर लिखे जाएंगे। लिखने वाले फर्जी बुद्धिजीवी नहीं होंगे, इतिहास के असली लेखक होंगे और इतिहास कभी फर्जी लोगों को माफ नहीं करता।

माओवाद से निपटने का, जैसा कि पहले कहा, एक ही रास्ता है और वह यह है कि उन्हें बारूद से उडा दिया जाए, जहां मिलें, वहां पेड पर फांसी से लटका दिया जाए, गर्दन कलम कर दी जाए या फिर सबसे पहले सुधरने का एक आखिरी मौका दिया जाए। सुधरने के अलावा बाकी सब तरीके वे हैं, जिन्हें माओवादी खुद इस्तेमाल करते हैं। समाज को सुधारने के बहाने वसूली और समानांतर सरकार का अहंकार पालने वाले माओवादियों को तो पाप लगना ही है, उनका साथ देकर अपने आपको प्रगतिशील साबित करने वालों को तो नर्क ही नसीब होगा।

ठ्ठ आलोक तोमर

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