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मैं ने चांदनी रात में नौका -विहार पर निबंध लिखा, ताज पर लिखा, ऊंट पर लिखा, गधे पर बहुत लिखा, पर मच्छर पर कुछ भी नहीं लिखा। हालांकि, मेरी पाठ्यपुस्तक में एक पाठ मच्छरों को समर्पित था। शायद पाठ्यक्रम तैयार करने वालों को मच्छरों की महानता का ज्ञान था। वे मेरे जैसे कोरे नहीं थे। खैर, जैसा कि मैंने मच्छरों पर कुछ नहीं लिखा, न ही मास्टरजी ने लिखवाया, पर आज नेता जैसे चमचों से घिरे रहते हैं, मैं अपने आपको मच्छरों से घिरा पा रहा हूं, तो मुझे भी उनकी श्रेष्ठता का भान होने लगा है। उनकी इस उच्चता से प्रभावित होकर यह निबंध लिख रहा हूं। यूं कहिए कि लिखने को मजबूर हुआ हूं।
अस्तु , हे मच्छरो, मुझे बख्शो! मुझे न काटो, इसलिए नहीं कि मैं आप पर निबंध लिख रहा हूं या आपकी चमचागीरी कर रहा हूं, बल्कि इसलिए कि गांवों, शहरों व कस्बों में और भी हैं, जिनके पास मच्छरदानियां नहीं हैं, शरीर पर लेप करने को ट्यूब नहीं है, आपको भगाने वाली क्वाइल नहीं है। उनके पास जो हैं, वे नालियां हैं, गटर हैं, रुके हुए पानी के गड्ढे हैं, अंधेरा है, झोपडी-झुग्गियां हैं, बदबूदार दलदल है। गरज यह कि वहां आफ लायक, आफ मनमाफिक वातावरण है। वहां आप मय परिवार मजे से रह सकते हो। वहां परिवार कल्याण का भी भय नहीं। आप जितनी चाहो, जैसे चाहो, जब चाहो, अपनी संतानें पैदा कर सकते हो। वहां की जलवायु आफ अनुकूल है। सो मच्छरो, वहीं जाओ।
मेरे पास क्या है ? अप्रकाशित पांडुलिपियां, प्रकाशित रचनाओं की कतरनें वगैरह-वगैरह। ये चीजें आफ काम की नहीं, दीमकों के काम की हैं। मुझे आपसे डर नहीं लगता। आपका साइज भी डराने लायक नहीं है। आफ काटने से भी डर नहीं लगता, क्योंकि हम आदी हो चुके हैं। डर लगता है, मलेरिया से, जिसके प्रसारक आप ही हैं। पहले तो मलेरिया से भी नहीं डरता था, पर जब से मलेरिया सही डॉयग्नोसिस नहीं हो पा रहा है या चिकित्सक ऐसे आ रहे हैं, जो मलेरिया को किसी और स्वरूप में बदल देते हैं, जिसके कारण यह लोक नहीं सुहाता, तब से मैं इससे भयभीत रहने लगा हूं। मलेरिया से डरने का एक कारण यह भी है कि अभी तक कोई मलेरिया बाण दवा ईजाद नहीं हुई है। अस्तु, हे मलेरिया के वाहक मच्छरो, अपने आवासों से आतंकवादी गतिविधियां चलाने वालो, कभी दिन में, तो कभी रात में अपने टार्गेटों पर टूट पडने वालो, हे सुमधुर संगीत सुनाने वालो, हे हर जगह मौजूद रहने वालो, कृपया मुझ से दूर ही रहो। मुझे नाहक क्यों परेशान करते हो?
आफ काटने से फैलने वाले मलेरिया की रोकथाम हेतु ढेरों सरकारी , गैर-सरकारी कार्यक्रम बनते हैं। घर-घर गोलियां बंटती हैं, कभी-कभी डीडीटी का छिडकाव किया जाता है, धुआं छोडा जाता है। लोग मलेरिया से बचाव हेतु निजी प्रयास भी करते हैं। इससे मलेरिया कागजों पर तो जड से समाप्त हो जाता है, पर मलेरिया के कीटाणु आप में यथावत बने रहते हैं। मैं जनता हूं कि मेरा यह निबंध आप नहीं पढेंगे। आप अपनी गतिविधियां चलाते रहेंगे, पर प्रभु! मुझे बख्श देना। मेरा निवेदन स्वीकार कर लेना।
--ओम उपाध्याय |