| | न गलतफहमी में रहो न देश को बरगलाओ | | | |
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कुछ आंकडे ऐसे होते हैं , जो आंकडेबाजी में माहिर हमारी सरकार को देश की असली सूरत दिखा ही जाते हैं, पर यह बात अलग है कि अपने ही आंकडों के मकडजाल में उलझी सरकार वह सूरत देखती नहीं। विश्व साक्षरता दिवस के दिन आंकडे आए थे कि देश में करीब 17 फीसदी बच्चों-किशोरों समेत लगभग 32 फीसदी नागरिक अब भी निरक्षर हैं। जो 68 फीसदी नागरिक साक्षर बताए गए हैं, उनमें शिक्षित कितने हैं, यूं तो यह सवाल भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि साक्षर और शिक्षित होने में जमीन-आसमान का फर्क होता है। जिसको नाम लिखना आ गया, साक्षर तो उसी को मान लिया जाता है, लेकिन यह योग्यता विकसित कर लेना शिक्षित होना नहीं होता। बहरहाल, थोडी देर के लिए हम शिक्षित और साक्षर के बीच के फर्क को भूल जाएं और केवल देश में व्याप्त निरक्षरता को देखें, तो तस्वीर बेहद कुरूप है।
देश में करीब 17 फीसदी बच्चे व किशोर इसके बावजूद निरक्षर हैं कि सरकार अशिक्षा का कलंक मिटाने के लिए तरह-तरह के प्रयास करने की नौटंकी कर रही है। देश के वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने संसद में अपने बजट भाषण में कहा था कि स्कूलों में मध्यान्ह भोजन की योजना चलने के कारण 98 फीसदी बच्चे स्कूल जाने लगे हैं। यदि उनका यह दावा सच था, तो देश में निरक्षर बच्चों की तादाद भी दो फीसदी होनी चाहिए थी। यह 17 फीसदी यदि है, तो मतलब यही है कि या तो प्रणब ने संसद में जो कहा था, वह सच नहीं था या फिर बच्चे स्कूल जा तो रहे हैं, पर पढ नहीं रहे। माजरा क्या है, यह तो प्रणबदा ही जानें, पर इस तथ्य से पूरा देश परिचित है कि वर्ष-1987 के बाद से देश इस मद में भारी-भरकम बजट खर्च कर रहा है, तो भी नतीजा शून्य है। वरना, साक्षरता का आंकडा एक दशक से भी ज्यादा समय से 68 फीसदी के आसपास क्यों अटका है?
चालू वित्त वर्ष में भी सर्वशिक्षा अभियान पर 31036 करोड रुपए खर्च होने हैं, जो पिछले बजट की तुलना में 15 फीसदी अधिक हैं। इधर, वयस्क शिक्षा का बजट भी तीन गुना बढाकर 1300 करोड रुपए किया गया था, फिर भी साक्षरता का आंकडा अपनी जगह से हिलने-डुलने को भी तैयार न हो, तो मानना पडेगा कि इस धन का दुरुपयोग ही हो रहा है। ताजा आंकडे आने के बाद सरकार की जिम्मेदारी है कि वह शिक्षा पर खर्च हो रहे धन का सही इस्तेमाल सुनिश्चित करे। न खुद गलतफहमी में रहे, न देश को बरगलाए। आंकडों के आईने में अपनी सूरत निहारे। |
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