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बागदी नदी बस हादसे से लेना होगा सबक
On 9/9/2010 9:31:02 PM

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मत कहो कि होनी को कौन टाल सकता है। यदि ड्राइवर ने सवारियों की बात मान ली होती और पानी में डूबे हुए रपटे पर से बस निकालने का जोखिम न उठाया होता, तो बस बाढ के कारण उफनती बागदी नदी में न गिरी होती और कई इनसानी जिंदगियां असमय काल के गाल में समाने से बच गई होतीं। देवास के खातेगांव के पास बस यदि नदी में गिरी है, तो यह बस चालक की आपराधिक लापरवाही का ही नतीजा है। उसके अलावा कुछ लोग और ऐसे हैं, जो प्रत्यक्ष तौर पर न सही, पर अप्रत्यक्ष रूप से इस हृदय विदारक घटना के अपराधी हैं। इस सवाल का जवाब परिवहन विभाग से मांगा जाना चाहिए की बस में एक सैकडा से ज्यादा सवारियां क्यों भरी हुई थीं? इधर, स्थानीय जनप्रतिनिधियों से भी पूछा जाए कि जब आप लोगों के लिए भारी-भरकम सांसद और विधायक निधियां मिलती हैं, तब बागदी नदी का रपटा पुल में क्यों तब्दील नहीं हो सका? इस सवाल का जवाब देने से प्रदेश सरकार भी नहीं बच सकती कि क्या वह हादसों में मारे जाने वाले लोगों के परिजनों को मुआवजा देने के लिए ही है या बुनियादी जन-सुविधाओं में इजाफा करने के लिए?

दावे लाख किए जाएं, पर राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 59-ए पर बागदी नदी पर पुल का न होना सिद्ध करता है कि प्रदेश का बुनियादी ढांचा चरमराया हुआ है। बागदी जैसे हादसों से बचने के लिए जरूरी है कि नदियों पर रपटों की जगह पुल बनवाए जाएं। परिवहन विभाग की मुश्कें कसी जाएं, ताकि वह बसों में ओवर लोडिंग करने वालों को दंडित करे। साथ ही इनसानों को मौत के मुंह में धकेलने वाले ड्राइवरों को कठोर दंड देने का प्रावधान भी करना होगा। वरना, हादसे होते रहेंगे, लोग असमय काल के ग्रास बनते रहेंगे और सरकार मुआवजा देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री करती रहेगी। इस सिलसिले पर पूर्ण विराम लगना ही चाहिए।

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