| | अदालत सवाल क्यों नहीं पूछ सकती? | | | |
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अरसे बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश के वरिष्ठ पत्रकारों से बातचीत की है। बहुत -से मुद्दे उठे थे, उस बैठक में, जिनके बारे में अब देश में चर्चा होगी। एक मुद्दा न्यायपालिका की भूमिका का भी है। देश में सड रहे अनाज को भूखी जनता में मुफ्त बांटने के सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर टिप्पणी करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा था कि न्यायपालिका को नीतियां निर्धारित करने के क्षेत्र में नहीं आना चाहिए। भूखों को अनाज बांटने के संदर्भ में न्यायपालिका की भावनाओं को समझने की बात कहते हुए उन्होंने कहा था कि गरीबी की रेखा से नीचे जीने वालों को घटी दरों पर तो अनाज दिया जा सकता है, पर मुफ्त नहीं बांटा जा सकता।
अनाज मुफ्त न बांटने की बात कृषि मंत्री ने भी कही है। इस संदर्भ में यह सवाल तो पूछा ही जा सकता है कि यदि देश की जनता को मुफ्त शिक्षा और मुफ्त चिकित्सा सुविधा देना सरकार का कर्तव्य हो सकता है , तो भूखे का पेट भरने की व्यवस्था करना कल्याणकारी राज्य की सरकार का दायित्व क्यों न हो? फिर यदि अनाज को सडने देने या भूखों में बांटने का ही विकल्प हो, तो ज्यादा सोचने की जरूरत ही कहां है? दूसरा विकल्प ज्यादा श्रेष्ठ है। कम से कम नष्ट होता अनाज किसी के काम तो आएगा। वह अनाज भूखों के पेट की आग तो बुझाएगा। बहरहाल, इस मुद्दे पर देश में बहस हो रही है। होनी भी चाहिए, पर न्यायपालिका को नीति बनाने के क्षेत्र में हस्तक्षेप न करने की सलाह देकर प्रधानमंत्री ने एक ऐसे मुद्दे को फिर से उठाया है, जो पहले भी कई बार उठा है। यह मुद्दा न्यायपालिका और विधायिका के कार्यक्षेत्र का है।
हमारे संविधान में स्पष्ट लिखा है कि न्यायपालिका , विधायिका व कार्यपालिका को अपने-अपने क्षेत्र में रहकर काम करना है। संविधान में यह भी स्पष्ट किया गया है कि न्यायपालिका को सरकार की नीतियों, कार्यों की व्याख्या-समीक्षा करना है और यह देखना कि सरकार कुछ संविधान-विरोधी तो नहीं कर रही है। सच्चाई यह भी है कि जब-जब न्यायपालिका कुछ ज्यादा सक्रिय हुई है, विधायिका और कार्यपालिका को खतरा लगने लगा है। क्या है यह खतरा? खतरा अधिकार-क्षेत्र के सीमित होने का है या कहना चाहिए कि सीमित होता लगने का है। अनाज की बर्बादी वाले ताजा प्रसंग में सरकार यह मान रही है कि किसानों के हितों के लिए अनाज की खरीदी, उसका भंडारण, उसका वितरण आदि सब उसके अधिकार क्षेत्र में आता है और न्यायपालिका को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। जब कोई सरकार अपने अधिकार क्षेत्र के बारे में तो जागरूक रहे, पर उन कर्तव्यों की अनदेखी करने लगे, जो उसके जनता के प्रति हैं, तो क्या किया जाए? ऐसे में जनता स्वयं सरकार पर उंगली उठा सकती है, विपक्ष सरकार की अकर्मण्यता को उजागर कर सकता है। धरने-प्रदर्शन आयोजित हो सकते हैं, आंदोलन किया जा सकता है। यह सब जायज है, तो फिर ऐसी स्थिति में हमारी व्यवस्था के एक महत्वपूर्ण अंग न्यायपालिका द्वारा कुछ कहना प्रधानमंत्री को हस्तक्षेप क्यों लगता है?
यह एक सच्चाई है कि हजारों टन अनाज सरकारी भंडारों में सड चुका है और लाखों टन अनाज सड रहा है , पर कुछ ही दिन पहले तक हमारा कृषि मंत्रालय मीडिया में उजागर हुई इस बात को स्वीकार ही नहीं कर रहा था। जब अखबारों में पचास हजार टन अनाज सडने की खबर छपी, तो कृषि मंत्रालय बता रहा था कि सिर्फ 11700 टन अनाज सडा है। अब उसी मंत्रालय ने न्यायालय में प्रस्तुत एक हलफनामे में कहा है कि 67 हजार टन से अधिक अनाज सड चुका है। सड चुका है, का मतलब भी इस हलफनामे में बताया गया है-‘मनुष्यों के खाने लायक नहीं रहा।’ आंकडों में इस अंतर के बारे में कृषि मंत्रालय का कहना है कि हमने आंकडों का आकलन अलग तरह से किया था। इस ‘अलग तरह’ का मतलब मंत्रालय ने नहीं बताया है, पर इसका परिणाम सब जानते हैं।
देश की आधी जनता भूखी सोती रही और सरकार के गोदामों में पडा अनाज सडता रहा। स्पष्ट है कि सरकार अपने कर्तव्यों के प्रति जागरूक नहीं है। यह विडंबना नहीं , तो और क्या है कि एक तरफ तो हमारी सरकार संसद में खाद्यान्न सुरक्षा विधेयक लाती है और दूसरी तरफ यह देखती रहती है कि अनाज सड रहा है, भूखों तक नहीं पहुंच रहा है? देश में पर्याप्त अनाज हो और देश का हर नागरिक पेट भरने लायक बने, यह देखना सरकार का कर्तव्य बनता है। इसीलिए तो सब्सिडी दी जाती है, गरीबों को सस्ता अनाज दिया जाता है। यदि यह सही है, तो जरूरत पडने पर मुफ्त अनाज देना गलत क्यों है? वह भी तब, जब लाखों टन अनाज सड रहा हो? न्यायपालिका ने इसी विडंबना-विसंगति की ओर सरकार का ध्यान खींचा है। यह मामला एक जनहित याचिका के माध्यम से न्यायालय के समक्ष आया। आंकडे न्यायालय के सामने थे, सड रहे अनाज के भी और भूखे पेट सोने वालों के भी। ऐसे में एक प्रबुद्ध और जागरूक न्यायपालिका से हम क्या अपेक्षा करते हैं? यही न कि वह सरकार को उसकी गलती का ज्ञान कराए? सरकार को बताए कि उसे क्या करना चाहिए? यही किया उच्चतम न्यायालय ने, तो इसमें गलत क्या है? गलत तो यह है कि प्रधानमंत्री को न्यायपालिका की जागरूकता-सक्रियता गलत लग रही है।
नहीं प्रधानमंत्रीजी , यह विधायिका के अधिकार-क्षेत्र का अतिक्रमण नहीं है। यह न करती, तो न्यायपालिका अपना कर्तव्य-पालन न करने का अपराध अवश्य करती। हमारे संविधान में व्यवस्था के तीनों अंगों विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के अधिकारों व कर्तव्यों को स्पष्ट परिभाषित किया गया है। अपेक्षा की गई है कि ये तीनों अंग एक-दूसरे के क्षेत्र का अतिक्रमण किए बगैर अपनी-अपनी भूमिका निभाने में एक-दूसरे की मदद करेंगे और एक आदर्श व्यवस्था बनाने में एक-दूसरे के पूरक बनेंगे। जरूरी है कि तीनों एक-दूसरे की सीमाओं का आदर करें, पर इतना ही जरूरी यह है कि तीनों एक-दूसरे की कमियों को भी रेखांकित करते रहें, ताकि कमियां दूर की जा सकें। न्यायपालिका की भावनाओं का आदर करने की बात कहने के साथ-साथ यदि प्रधानमंत्री यह भी स्वीकार कर लेते कि भूख, गरीबी और अनाज के सडने के समीकरण को समझने में कहीं चूक हुई है व हम इसको सुधारने के लिए कृत-संकल्प हैं, तो बेहतर होता।
अभी तो हमारी सरकार के पास देश के गरीबों की पूरी संख्या भी नहीं है। उसे यह भी पता नहीं कि कुल कितना अनाज सड चुका है , कितना सड रहा है? सरकार को शायद यह भी नहीं पता कि बीस रुपए रोज कमाने वाला हर दूसरा भारतीय सस्ती दरों पर भी पर्याप्त अनाज खरीदने की स्थिति में नहीं है और कितनों तक पहुंचा पा रहे हैं, हम राशन का सस्ता अनाज? इसीलिए बेहतर होगा कि सरकार अधिकार क्षेत्र के अतिक्रमण की बात करने की बजाय कर्तव्यों की पूर्ति की ओर ध्यान दे। संवेदनशील सरकार का यही मतलब होता है, कुछ और नहीं होता।
--विश्वनाथ सचदेव |
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