| | अब वापस नहीं लौट सकता पुराना जमाना | | | |
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जमाने के साथ चलना लगातार मुश्किल होता जा रहा है। ऐसा नहीं है कि जाम लगा हुआ है , बल्कि इधर शहरों में जो जाम लग रहे हैं, वे तो जमाने के साथ चलने के ही सबूत हैं। ऐसा भी नहीं है कि सरकार की ओर से ढिलाई हो रही है। जमाने के साथ चलना कोई कॉमनवेल्थ गेम्स कराना थोडे ही है कि ढिलाई हो जाएगी, बल्कि शरद पवारजी ने जब कहा कि सुप्रीम कोर्ट के कहे मुताबिक खुले में सडते अनाज को गरीबों में मुफ्त बांटना संभव नहीं है, तो वह जमाने के साथ चलने की ही कोशिश कर रहे थे। आप तो जानते हैं कि जमाना ऐसा आ गया है कि कुछ भी मुफ्त नहीं रहा। अब न शिक्षा मुफ्त रही, न स्वास्थ्य।
हालांकि , सरकार कानून बनाकर व अदालतें उन्हें लागू कराकर गरीबों को कुछ-कुछ मुफ्त दिलाने की कोशिश करती रहती हैं। जैसे कि पब्लिक स्कूलों में उनके बच्चों के लिए कुछ सीटें और फाइव स्टार अस्पतालों में उनके लिए कुछ बिस्तर, पर न स्कूल सीटें देते हैं और न अस्पताल बिस्तर, क्योंकि जमाना मुफ्त का रहा ही नहीं, बाजार का है। एक जमाना था, जब राजनीतिक दल चुनावों में किसानों को मुफ्त बिजली देने का वादा करते थे। फिर, सरकार बनने पर मुफ्त बिजली देनी भी पडती थी, पर फिर दोनों पछताते भी थे। सरकार मुफ्त बिजली देकर कि ऐसा वादा किया ही क्यों और किसान मुफ्त बिजली लेकर कि इससे अच्छा तो खरीद ही लेते। सरकार के मददगार अर्थशास्त्री कुढते रहते थे कि यह न तो अच्छी राजनीति है, न ही अच्छा अर्थशास्त्र, क्योंकि जमाना मुफ्त का नहीं, बाजार का है। फिर वो जमाना भी आपको याद होगा, जब शहरों में झुग्गी वालों को मुफ्त प्लॉट मिला करते थे।
राजनीतिक दल उनसे मुफ्त प्लॉट देने के वादे करते थे। उनके लिए राशन कार्ड बनवाए जाते थे , नेताओं को वोट दिए जाते थे और दलालों को दलाली। कुछ भी मुफ्त नहीं था। बस मुफ्त प्लॉट की आस ही होती थी, पर अब वो जमाना भी नहीं रहा। अब तो आप देख रहे हैं कि सडक का इस्तेमाल ही मुफ्त नहीं रहा। कदम-कदम पर टोल-टैक्स लगता है। गाडी वालों का तो कई बार पेट्रोल कम फुंकता है, टोल-टैक्स ज्यादा लगता है। पहले मुफ्त पानी पिलाने के लिए प्याऊ लगाए जाते थे और पुण्य कमाया जाता था। अब पानी से नोट कमाए जाते हैं। ऐसे में जब सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनाज को सडाने से तो अच्छा है कि गरीबों में मुफ्त बांट दो, तो कृषि मंत्री ने कहा कि मुफ्त कुछ नहीं मिलने वाला।
गलती उनकी भी नहीं। वह जमाने को तो खूब समझते हैं। यदि न समझते , तो आज क्रिकेट के बेताज बादशाह थोडे होते। कोर्ट की बात समझने में भी उनसे चूक इसलिए हुई, क्योंकि मुफ्त का जमाना तो रहा ही नहीं। उन्हें क्या पता था कि कोर्ट पुराने जमाने वाली बात करने लगेगा। जमाने को बखूबी समझने और कोर्ट की बात समझने में चूक जाने के चलते ही उन्हें कोर्ट की डांट खानी पडी। शरद पवारजी ने कहा कि हुक्म सिर-माथे, पर ऐसा तो नहीं होगा। पुराना जमाना वापस लौट ही नहीं सकता। अतः सबको जमाने के साथ ही चलना पडेगा, नेताओं की तरह।
--सहीराम |
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