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रोजेदारों को अल्लाह का इनाम है ईद
On 9/10/2010 10:01:37 PM

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सेवइयों में लिपटी मोहब्बत की मिठास का त्योहार है, ‘ईद-उल-फितर। दरअसल, इस पर्व के इस नाम में दो शब्द शामिल हैं,-‘ईदऔर फित्र। असल में ईद के साथ फित्र को जोडे जाने का एक खास मकसद है। यह रमजान में जरूरी की गई रुकावटों को खत्म करने का ऐलान है। यह इसका ऐलान भी है कि ईद छोटे-बडे, अमीर-गरीब सभी की होती है। यह नहीं कि पैसे वालों यानी साधन-संपन्न लोगों ने रंगारंग, तडक-भडक के साथ यह त्योहार मना लिया और गरीब-गुरबा मुंह देखते रहे गए। ईद-उल-फितर भूख-प्यास सहन करके एक महीने तक सिर्फ खुदा को याद करने वाले रोजेदारों को अल्लाह का इनाम है। मुसलमानों का सबसे बडा त्योहार कहाने वाला यह पर्व न सिर्फ हमारे समाज को जोडने का मजबूत सूत्र है, बल्कि यह इस्लाम के प्रेम और सौहार्द्र भरे संदेश को भी पुरअसर ढंग से फैलाता है और समाज में मेल-जोल को बढाता है।

ईद का दिन खुशी का त्योहार इसलिए है, क्योंकि रमजान का महीना, जो एक तरह से परीक्षा का महीना होता है, वह अल्लाह के नेक बंदों ने पूरी अकीदत और लगन से अल्लाह के हुक्मों पर चलने में गुजारा। परीक्षा में पास हो जाना खुशी की बात ही होती है। इस कडी आजमाइश के बाद का तोहफा है, ईद। किताबों में आया है कि रमजान में पूरे रोजे रखने वालों को तोहफा है, ईद। ऐसा तोहफा, जो बंदों को खुशियों से सराबोर कर देता है। इस दिन अल्लाह की रहमत पूरे जोश पर होती है और अपना हुक्म पूरा करने वाले बंदों को रहमतों की बारिश से भिगो देती है। अल्लाह पाक रमजान की इबादतों के बदले अपने नेक बंदों को बख्शे जाने का ऐलान फरमा देते हैं। ईद की नमाज के जरिए बंदे खुदा का शुक्र अदा करते हैं कि उसने ही हमें रमजान का पाक महीना अता किया, फिर उसमें इबादतें करने की तौफीक दी और इसके बाद ईद का तोहफा दिया। ईद-उल-फित्र इस बात का ऐलान है कि अल्लाह की तरफ से जो पाबंदिया माह--रमजान में तुम पर लगाई गई थीं, वे अब खत्म हो जाती हैं। इसी फित्र से फित्राबना है और हर सक्षम मुसलमान को अपनी कुल संपत्ति के ढाई प्रतिशत हिस्से के बराबर की रकम निकालकर उसको गरीबों में बांटना होता है तथा इस हिस्से को ईद की नमाज से पहले अदा करना जरूरी होता है। इससे समाज के प्रति उसकी जिम्मेदारी का निर्वहन होता है।

इसके साथ ही गरीब रोजेदार भी अल्लाह के इनाम रूपी त्योहार को मना पाते हैं। इस त्योहार को मीठी ईद भी कहा जाता है। मीठी ईद भी कहा जाने वाला यह पर्व खासतौर पर भारतीय समाज के ताने-बाने और उसकी भाईचारे की सदियों पुरानी परंपरा का वाहक है। इस दिन विभिन्न धर्मों के लोग गिले-शिकवे भुलाकर एक-दूसरे से गले मिलते हैं और सेवइयां अमूमन उनकी कडवाहट को मिठास में बदल देती हैं। यही इस पर्व की ताकत है। ईद सामाजिक तालमेल और मोहब्बत का मजबूत धागा है। यह त्योहार हमारे समाज की परंपराओं का आईना भी है। एक रोजेदार के लिए इसकी अहमियत का अंदाजा अल्लाह के प्रति उसकी कृतज्ञता से लगाया जा सकता है।

दुनिया में चांद देखकर रोजा रखने और चांद देखकर ईद मनाने की पुरानी परंपरा है और आज के हाईटेक युग में तमाम बहस-मुबाहिसे के बावजूद यह रिवाज कायम है। परंपराओं और रिवाजों पर कायम रहने में ही इनसानियत है। रिवाजों को छोड देने वाला इनसान अपनी जडों से कट जाता है। हमें अपनी जडों से कटना नहीं हैं, बल्कि उनको सींचना है, ताकि परंपराओं का वृक्ष हमेशा हरा-भरा बना रहे। यही परंपराएं तो हमारी पहचान हैं। व्यापक रूप से देखा जाए, तो रमजान और उसके बाद ईद व्यक्ति को एक इनसान के रूप में सामाजिक जिम्मेदारियों को अनिवार्य रूप से निभाने का दायित्व भी सौंपती है। ईद जैसा त्योहार हम सभी को अपनी जडों की तरफ वापस खींच लाता है और यह अहसास कराता है कि पूरी मानव जाति एक है और इनसानियत ही उसका मजहब है। हम इस महापर्व पर इनसानियत का पैगाम फैलाएं। नेकी के रास्ते पर चलें और दूसरों को भी नेकी के रास्ते पर चलने की प्रेरणा दें। समाज में भाईचारा कायम करें और उन लोगों की भलाई करें, जो लाचार हैं। उनकी लाचारगी को दूर करना हम सक्षम इनसानों की ही जिम्मेदारी है।

--अतीक खान

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