उत्तरप्रदेश के वोटरों ने कमाल कर दिया*प्रणबदा की नींद उड़ने का कारण वाजिब*किसानों की तकलीफ समझें सरकारें*ओप्रा क्या जानें लाल बत्ती लांघने का सुख*मैकाले के मानसपुत्रों के चंगुल में देश*अपोलो टायर्स का मुनाफा 19 प्रतिशत घटा*हीरा निर्यातकों ने की कर ढांचा सरल बनाने की मांग*मुनाफावसूली से सोना, चांदी कमजोर*सेंसेक्स 123 अंक व निफ्टी 44 अंक उछला*निर्यात कम आयात ज्यादा*
मंत्री ने अपने क्षेत्र में बंद कराई बिजली, रोका अखबार
महानायक अमिताभ बच्चन बीमार, कल होगी पेट की सर्जरी
अज्ञात हत्यारे ने मासूम की पत्थर मारकर हत्या की !
मिल सकता है पीजी डिग्री के साथ नौकरी का अवसर
मुख्यपृष्ठ राष्ट्रीय विश्व शहर  व्यापार खेल मनोरंजन शिक्षा सम्पादकीय क्लासिफाइड Appointment पत्रिकाएँ आज का पंचांग
एक बार हो ही जाने दो जातीय जनगणना
On 9/10/2010 10:01:58 PM

Change font size:A | A

Print

E-mail

Comments

Rating

Bookmark

यदि केंद्र सरकार अपने कहे पर कायम रही, तो डरते-डरते ही सही, उसने देश में जाति-आधारित जनगणना कराने का निर्णय ले ही लिया है। उसकी मंशा पर संदेह इसलिए है कि जो कार्य अभी यानी जनगणना के दूसरे चक्र के साथ किया जा सकता है, वह जून-2011 तक के लिए क्यों टाला गया? लिहाजा, संभव है कि तब कोई और बहाना बनाकर मामले को फिर आगे खिसका दिया जाए! जो भी हो, पर इतना तो कहना ही होगा कि जाति-आधारित जनगणना में बुराई कुछ भी नहीं है। जातिवाद इस देश का जितना नुकसान कर सकता था, वह हो चुका है। भारत यदि करीब एक हजार साल तक गुलाम रहा, तो इसका एक प्रमुख कारण जातिवाद ही तो था। विदेशी आक्रांता छोटी-छोटी सेनाओं को लेकर आए और हमारे बडे-बडे साम्राज्यों को ध्वस्त करने में सफल रहे, तो क्या था, इसका कारण? यही कि समाज अपने राजे-रजवाडों के साथ नहीं था, क्योंकि वह जातियों में बंटा हुआ था।

आजाद भारत में इससे सबक लिया जाना चाहिए था और जातीय ढांचे को नष्ट करने के प्रयास होने चाहिए थे, पर क्या हुआ? सभी राजनीतिक दलों-सरकारों ने इस बुराई का यथासंभव दोहन ही किया, अपनी सत्ता को मजबूत करने के लिए। वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जो हिंदुत्व की बात करता है, जातिवाद को खत्म करना तो उसके एजेंडे में भी नहीं है। शाखाओं में दक्ष-आर्म करने या सहभोज जैसे चोचले करने से जातिवाद खत्म नहीं हो सकता। यह केवल दिखावा है और इसलिए किया जाता है कि देखो, हम जातिवाद के विरोधी हैं। आर्य समाज ने छुआछूत को खत्म करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया, पर अव्वल तो इसका खात्मा हुआ ही नहीं, पर मान लो कि हो ही गया, तो छुआछूत का खत्म हो जाना जातिवाद का खत्म होना तो नहीं ही है।

जातिवाद का भूत आज एक-एक भारतीय या यूं कहें कि हिंदू के सिर पर सवार है। जातिवाद के खिलाफ धाराप्रवाह भाषण देने वालों के सिर पर भी यह भूत तब नाचता दिखता है, जब वे अपनी संतानों के लिए रिश्ते ढूंढते या उनकी संतान विजातीय प्रेम विवाह कर लेती है। विजातीय विवाह देश में अपवाद-स्वरूप ही खुले दिलो-दिमाग से स्वीकार किए जाते हैं, सच यही है। इसके बाद हमें जातिवाद का सच भी स्वीकार करना पडेगा। सही है कि यह भारतीय समाज की एक बीमारी ही है, पर रोगी वही स्वस्थ हो सकता है, जो अपनी बीमारी को स्वीकार कर ले। जाति-आधारित जनगणना बीमारी को स्वीकार करने की दिशा में पहला कदम है।

Post Comments
More News
मैकाले के मानसपुत्रों के चंग...
ओप्रा क्या जानें लाल बत्ती ल...
किसानों की तकलीफ समझें सरकार...
प्रणबदा की नींद उड़ने का कार...
उत्तरप्रदेश के वोटरों ने कमा...
क्रांति की उपलब्धियों को खो ...
चल रहा आश्वासन बांटने का अभि...
नाम, नमक और निशान के मायने...
मालदीव में सैनिक शासन की आहट...
मंत्रियों को यह सजा तो पर्या...
टाइम की आपत्ति को तवज्जो क्य...
पाकिस्तान की कश्मीर नीति में...
चल भी सकता है प्रियंका का जा...
हे फेसबुकजी, तुम्हें ढेरों श...
अमेरिका ने गंवा दिया एक बढ़ि...
 सम्पर्क करें  विज्ञापन दरें आपके सुझाव संस्थान
© Copyright of Rajexpess 2009,all right reserved.
Developed & Designed By: