| | एक बार हो ही जाने दो जातीय जनगणना | | | |
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यदि केंद्र सरकार अपने कहे पर कायम रही , तो डरते-डरते ही सही, उसने देश में जाति-आधारित जनगणना कराने का निर्णय ले ही लिया है। उसकी मंशा पर संदेह इसलिए है कि जो कार्य अभी यानी जनगणना के दूसरे चक्र के साथ किया जा सकता है, वह जून-2011 तक के लिए क्यों टाला गया? लिहाजा, संभव है कि तब कोई और बहाना बनाकर मामले को फिर आगे खिसका दिया जाए! जो भी हो, पर इतना तो कहना ही होगा कि जाति-आधारित जनगणना में बुराई कुछ भी नहीं है। जातिवाद इस देश का जितना नुकसान कर सकता था, वह हो चुका है। भारत यदि करीब एक हजार साल तक गुलाम रहा, तो इसका एक प्रमुख कारण जातिवाद ही तो था। विदेशी आक्रांता छोटी-छोटी सेनाओं को लेकर आए और हमारे बडे-बडे साम्राज्यों को ध्वस्त करने में सफल रहे, तो क्या था, इसका कारण? यही कि समाज अपने राजे-रजवाडों के साथ नहीं था, क्योंकि वह जातियों में बंटा हुआ था।
आजाद भारत में इससे सबक लिया जाना चाहिए था और जातीय ढांचे को नष्ट करने के प्रयास होने चाहिए थे , पर क्या हुआ? सभी राजनीतिक दलों-सरकारों ने इस बुराई का यथासंभव दोहन ही किया, अपनी सत्ता को मजबूत करने के लिए। वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, जो हिंदुत्व की बात करता है, जातिवाद को खत्म करना तो उसके एजेंडे में भी नहीं है। शाखाओं में दक्ष-आर्म करने या सहभोज जैसे चोचले करने से जातिवाद खत्म नहीं हो सकता। यह केवल दिखावा है और इसलिए किया जाता है कि देखो, हम जातिवाद के विरोधी हैं। आर्य समाज ने छुआछूत को खत्म करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया, पर अव्वल तो इसका खात्मा हुआ ही नहीं, पर मान लो कि हो ही गया, तो छुआछूत का खत्म हो जाना जातिवाद का खत्म होना तो नहीं ही है।
जातिवाद का भूत आज एक -एक भारतीय या यूं कहें कि हिंदू के सिर पर सवार है। जातिवाद के खिलाफ धाराप्रवाह भाषण देने वालों के सिर पर भी यह भूत तब नाचता दिखता है, जब वे अपनी संतानों के लिए रिश्ते ढूंढते या उनकी संतान विजातीय प्रेम विवाह कर लेती है। विजातीय विवाह देश में अपवाद-स्वरूप ही खुले दिलो-दिमाग से स्वीकार किए जाते हैं, सच यही है। इसके बाद हमें जातिवाद का सच भी स्वीकार करना पडेगा। सही है कि यह भारतीय समाज की एक बीमारी ही है, पर रोगी वही स्वस्थ हो सकता है, जो अपनी बीमारी को स्वीकार कर ले। जाति-आधारित जनगणना बीमारी को स्वीकार करने की दिशा में पहला कदम है। |
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