| | सवालों के दायरे में है केंद्र सरकार की मंशा | | | |
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कांग्रेस के नेतृत्व वाली ‘धर्मनिरपेक्ष’ यूपीए सरकार आजकल सच्चर कमेटी की सिफारिशों वाली फाइल के पन्ने कुछ ज्यादा ही तेजी से उलटने-पलटने लगी है। बताते चलें कि केंद्र सरकार ने सेवानिवृत्त न्यायाधीश न्यायमूर्ति राजिंदर सच्चर की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया था, 9 मार्च-2005 को। इस समिति को काम यह सौंपा गया था कि वह देश के मुस्लिमों की आर्थिक, शैक्षिक और सामाजिक स्थिति का पता लगाए। बहरहाल, समिति ने अपनी सिफारिशें नवंबर-2006 में सरकार को सौंप दी थीं। अब माजरा यह है कि हमारी सरकार जब-तब सनकती व सच्चर समिति की सिफारिशें खोलकर बैठ जाती है, जबकि देश में एक बड़े वर्ग का मानना यह भी है कि सच्चर समिति की सिफारिशें देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे के अनुकूल बिलकुल नहीं हैं। हम नहीं कह सकते कि यह धारणा सही है या गलत, पर शुक्रवार को केंद्र ने राज्यों को जिस एक सिफारिश को लागू करने के लिए पत्र लिखा है, उस सिफारिश को सही नहीं माना जा सकता।
केंद्रीय गृह सचिव ने सभी राज्यों के प्रमुख सचिवों को पत्र लिखकर कहा है कि वे सच्चर समिति की सिफारिशों के अनुरूप मुस्लिम बहुल इलाकों के थानों में कम से कम एक मुस्लिम इंस्पेक्टर या सब-इंस्पेक्टर की नियुक्ति जरूर करें, ताकि मुस्लिमों का भरोसा जीता जा सके। यहां दो चुभते हुए सवाल पैदा होते हैं? एक-क्या पुलिस को सांप्रदायिक नजरिए से देखना उचित है? यदि है, तो क्या आगे मुस्लिम न्यायाधीश, मुस्लिम प्रशासनिक अधिकारी आदि की मांग नहीं उठेगी? दूसरा सवाल, क्या मुस्लिम भारतीय शासन-प्रशासन और भारतीयता पर भरोसा नहीं करते हैं? यदि करते हैं, तो चिट्ठी या फिर सच्चर समिति की सिफारिशों में मुस्लिमों का भरोसा जीतने की बात क्यों कही गई है? जरूरत इस बात की है कि सरकार से इन सवालों के जवाब मांगे ही जाएं। |
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